विकास में इतिहास, संस्कृति तथा भूगोल को ध्यान रखने की अपरिहार्य आवश्यकता

वाराणसी,02 फरवरी (हि.स.)। गिफू विश्वविद्यालय, जापान के विजिटिंग प्रोफेसर राणा पी.बी. सिंह ने वाराणसी में मंदिरों के विकास का जिक्र कर कहा कि विकास में इतिहास, संस्कृति तथा भूगोल को ध्यान रखने की अपरिहार्य आवश्यकता है। काशी का विकास सिर्फ भौतिक विकास से जुड़ा नही है बल्कि काशी की आध्यात्मिकता भी पूर्णतः वैज्ञानिक एवं तार्किक है। प्रो.राणा शुक्रवार को दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित कर रहे थे। वाराणसी इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिस्ट्री के तत्वावधान में बीएचयू मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र सभागार में आयोजित सम्मेलन में प्रो. राणा ने कहा कि काशी को कई यूरोपियन वैज्ञानिकों ने कसौटी पर कसने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है की काशी के कंकर कंकर में जो शंकर हैं वो भी वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुका है। काशी की सभी यात्राएं और महात्म्य जो भी हम सुनते है वह सभी तार्किक रूप से सत्य है। सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि बेल्जियम के डॉ. कोएनार्ड एल्स्ट ने कहा कि सम्मेलन से वाराणसी के बहुआयामी विकास को एक नई दिशा मिलेगी। डॉ. कोएनार्ड ने सम्मेलन में वाराणसी के ग्लोरियस हेरिटेज पर विमर्श की सराहना भी की।

 

सम्मेलन में काशी हिदू विश्वविद्यालय के विधि अधिकारी डॉ. अभय पांडेय ने कहा कि शिव के मंदिर के विकास के लिए कुछ छोटे मंदिरों को विस्थापित करना पड़ा । लेकिन वह सभी उसी मंदिर में प्रतिस्थापित है और सभी मूर्तियां शिव ही है। डॉ. प्रवीण कुमार शर्मा ने छात्र छात्राओं को आईसीएचआर के फेलोशिप सहित अन्य ग्रांट की जानकारी दी। सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए पूर्व निदेशक आकाशवाणी गोरखपुर नीरजा माधव ने कहा कि साहित्य से ही प्रभु श्रीराम जन -जन तक पहुंचे हुए हैं लेकिन बिना इतिहास और पुरातत्व को समझे हम श्रीराम की वास्तविकता को नही समझ सकते। काशी दो-दो मां से संपोषित है मां गंगा और मां अन्नपूर्णा। यही कारण है कि यह शंभू की धरती है। काशी का नागरिक होने का मतलब है कि पूरे ब्रह्मांड का नागरिक होना। काशी के भावमई रूप साहित्य से मिलता है। काशी का मूल स्वभाव शिव के स्वभाव के कारण ऐसा है। काशी की निरंतरता तो है लेकिन स्वरूप निरंतर बदलता जा रहा है। सम्मेलन में स्वागत भाषण संस्थान की संस्थापिका निदेशक एमेरिटस प्रोफेसर अरुणा सिन्हा ने दिया। सम्मेलन की संगठन सचिव जयलक्ष्मी कौल ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत किया। उदघाटन सत्र में मंच संचालन डॉ कल्पना सिंह,धन्यवाद ज्ञापन डॉ.दीपक कुमार ने दिया। सम्मेलन में 150 से अधिक प्रतिनिधियों ने भागीदारी की।