विदेशी मुद्रा भंडार में फिर से आई भारी गिरावट, अगले 12 महीनों में करना है 256 बिलियन डॉलर का रीपेमेंट, जानिए अब क्या होगा

देश का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) सात जनवरी को समाप्त सप्ताह में 87.8 करोड़ डॉलर घटकर 632.736 अरब डॉलर रह गया. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI on foreign reserves) के शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार इससे पहले 31 दिसंबर को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 1.466 अरब डॉलर घटकर 633.614 अरब डॉलर रह गया था. जबकि तीन सितंबर, 2021 को समाप्त सप्ताह में यह मुद्रा भंडार रिकार्ड 642.453 के उच्च स्तर पर पहुंच गया था. आरबीआई के साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार सात जनवरी को समाप्त समीक्षाधीन सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट आने की वजह विदेशी मुद्रा आस्तियों (एफसीए) में कमी आना है, जो कुल मुद्रा भंडार का अहम हिस्सा होता है.

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, सप्ताह के दौरान एफसीए 49.7 करोड़ डॉलर घटकर 569.392 अरब डॉलर रह गया. डॉलर में अभिव्यक्त किये जाने वाले विदेशीमुद्रा आस्तियों में विदेशी मुद्रा भंडार में रखे यूरो, पौंड और येन जैसे गैर-अमेरिकी मुद्रा के घट -बढ़ को भी शामिल किया जाता है. इस दौरान स्वर्ण भंडार का मूल्य 36 करोड़ डॉलर घटकर 39.044 अरब डॉलर रह गया.

SDR में 1.6 करोड़ डॉलर की गिरावट

आलोच्य सप्ताह में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के पास विशेष आहरण अधिकार 1.6 करोड़ डॉलर घटकर 19.098 अरब डॉलर रह गया. अंतररराष्ट्रीय मुद्राकोष में देश का मुद्रा भंडार भी 50 लाख डॉलर घटकर 5.202 अरब डॉलर रह गया.

256 बिलियन डॉलर का करना है रीपेमेंट

देश के विदेशी मुद्रा भंडार की इस साल कड़ी परीक्षा होने वाली है. भारत को 256 बिलियन डॉलर के ओवरसीज डेट का रीपेमेंट करना है. इधर अमेरिकी फेडरल रिजर्व मॉनिटरी पॉलिसी को टाइट करने की तैयारी में है. इंट्रेस्ट रेट बढ़ाने से डॉलर का पतन तेज हो जाएगा. सितंबर में फाइनेंस मिनिस्ट्री की तरफ से जो डेटा जारी किया गया था उसके मुताबिक, अगले 12 महीनों में 256 बिलियन डॉलर का विदेशी कर्ज मैच्योर हो रहा है. सितंबर 2021 में टोटल विदेशी कर्ज 596 बिलियन डॉलर था.

फेडरल इंट्रेस्ट रेट बढ़ाएगा तो डॉलर आउटफ्लो तेज होगा

रिजर्व बैंक के मॉनिटरी पॉलिसी की बात करें तो आने वाले समय में RBI की तरफ से मुद्रा की रक्षा के बजाय अपने हस्तक्षेप को कम करने की संभावना ज्यादा है. अमेरिका में महंगाई दर 39 सालों के उच्चतम स्तर पर है. ऐसे में फेडरल रिजर्व समय से पहले इंट्रेस्ट रेट बढ़ा सकता है. अगर ऐसा होता है तो भारत जैसे देशों से डॉलर का पतन होगा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा. दुनिया के विकसित देश जैसे-जैसे इंट्रेस्ट रेट बढ़ाएंगे, भारत जैसी इमर्जिंग इकोनॉमी से डॉलर आउटफ्लो बढ़ेगा.

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