रामधारी को दिनकर बनाने वाली पाठशाला कह रही है ”जब नाश मनुज पर छाता है..”

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बेगूसराय, 22 सितम्बर (हि.स.)। 23 सितम्बर को देशवासी हिन्दी साहित्य के सूर्य कहे जाने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 114 वी जयंती मनाएंगे। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों सहित दिनकर जी के गृह जनपद बेगूसराय में भी विविध कार्यक्रम आयोजित होंगे।

इस कार्यक्रम में शामिल बड़े-बड़े नेता और जनप्रतिनिधि दिनकर के कृतित्व और व्यक्तित्व की चर्चा करेंगे, भाषणों की बड़ी-बड़ी श्रृंखला चलेगी। लेकिन राष्ट्रकवि के स्मृति को संजोने की बातें सिर्फ कोरी बकवास रह जाती है और जयंती एवं पुण्यतिथि के बाद इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं रहता है।

राष्ट्रकवि से जुड़ा दो धरोहर उनके गृह जनपद बेगूसराय में है। एक है मध्य विद्यालय बारो, जहां रामधारी नाम के छात्र ने कविता का ककहरा पढ़ा और दिनकर बन गए। दूसरी जगह है दिनकर जी के पैतृक गांव सिमरिया का वह दलान (दरवाजा), जहां बैठकर दिनकर जी ने ”संस्कृति के चार अध्याय” और ”रश्मिरथी” जैसे कालजयी साहित्य की रचना की थी। पटना हाई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने सैयद ताहिर हुसैन के पिता द्वारा 1875 में स्थापित मध्य विद्यालय बारो में पांचवीं कक्षा के छात्र के रूप में 1921 में रामधारी नाम के छात्र का नामांकन हुआ था।

उस समय यह विद्यालय सातवीं कक्षा तक के लिए चलता था, जहां सातवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दो फरवरी 1924 को स्थानांतरण प्रमाण पत्र संख्या-43 के माध्यम से वह विद्यालय से निकले और आगे की शिक्षा के लिए मोकामा हाई स्कूल में नामांकन कराया। विद्यालय में पढ़ने वाले गांव के बूढ़े-बुजुर्गों की मानें तो यहीं से रामधारी के रामधारी सिंह दिनकर बनने की शुरुआत हुई थी। उस दौर में जब आरकेसी उच्च विद्यालय बरौनी सहित अन्य कहीं भी कविता पाठ, कवि गोष्ठी होता था तो रामधारी सिंह छोटी-छोटी कविता के माध्यम से उसमें शामिल होते थे।

इस विद्यालय को राष्ट्रीय गौरव का स्मारक बनाने के लिए लगातार प्रयास चल रहा है, लेकिन राजनीतिक और अन्य उपेक्षा के कारण किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। बरौनी रेलवे स्टेशन और एशिया के सबसे बड़े रेलवे यार्ड से महज एक किलोमीटर की दूरी पर स्थापित इस विद्यालय के जिस वर्ग कक्ष में रामधारी सिंह दिनकर पढ़ते थे। उसके उद्धार के लिए लगातार प्रयास हुए गए, बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुई, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। 2016 में जब विजय कुमार सिंह प्रधानाध्यापक बने तो उन्होंने लगातार पत्राचार किया, ताकि जिस भवन में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर तीन वर्षों तक पढ़ते रहे, उसे राष्ट्रीय धरोहर बनाया जाए।

स्थानीय जनप्रतिनिधि, विधायक राम रतन सिंह, विधान पार्षद रजनीश कुमार, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, राज्य सभा सदस्य राकेश सिन्हा, बरौनी रिफाइनरी, एनटीपीसी को लगातार पत्राचार किया गया, बावजूद इसके किसी का कोई ध्यान नहीं गया। हालत यह है कि ना सिर्फ रामधारी सिंह दिनकर का वर्ग कक्ष, बल्कि विद्यालय उपेक्षा का शिकार लगातार होता रहा। इस विद्यालय में नामांकित 12 सौ बच्चों के लिए पढ़ाने के लिए मात्र 14 शिक्षक और 11 कमरा है, आठवीं क्लास के बच्चे भी नीचे बैठते हैं।

विद्यालय क्षेत्र बीहट नगर परिषद के अधीन आया तो तत्कालीन मुख्य पार्षद ने इसके उद्धार की योजना बनाई, डीपीआर बन गया, फिर अधर में लटक गया। 2020 के मार्च में बाल मेला में शामिल होने आए तत्कालीन मटिहानी विधायक नरेन्द्र कुमार सिंह उर्फ बोगो सिंह ने जब राष्ट्रीय स्तर के धरोहर की उपेक्षा देखी तो विधान पार्षद दिलीप चौधरी से अनुरोध कर नौ लाख 96 हजार तीन सौ की योजना दिलाया। इस फंड से दिनकर जी के प्रारंभिक पाठशाला में पांच कमरा की ढलाई तो हो गई, लेकिन उसे एतिहासिक स्वरूप में रखने की सारी कवायद फेल हो चुकी है।

विद्यालय शिक्षा समिति के पूर्व अध्यक्ष और इस विद्यालय के छात्र रहे प्रमोद सिंह बताते हैं कि गांव के जमींदार मौलवी साहब द्वारा स्थापित विद्यालय का भवन अंग्रेज ने बनवाया था। इस विद्यालय में दिनकर जी ही नहीं, पटना हाई कोर्ट के न्यायाधीश खान बहादुर ताहिर हुसैन, बिहार के प्रथम सिंचाई मंत्री रामचरित्र सिंह सहित कई आईएएस अधिकारी, आईपीएस अधिकारी, भाभा एटॉमिक रिसर्च के वैज्ञानिक, भारतीय न्यायिक सेवा के अधिकारी आदि शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं।

लेकिन उज्जवल इतिहास वाले इस विद्यालय का वर्तमान पूरी तरह से धूमिल है। सौंदर्यीकरण और मूल स्वरूप में लाने का सभी प्रयास फेल हो चुका है। राजनेताओं और राजनीतिज्ञों ने इस धरोहर को सहेजने के बदले पूरी तरह से ध्वस्त करने का संकल्प ले लिया है। प्रमोद सिंह ने बताया कि गरीबी के कारण नंगे पांव आकर रामधारी सिंह तीन वर्षों तक इस विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करते रहे। गांव के ही बच्चों के संग उसके घर जाकर दोपहर में खाना खाते थे। उनके हृदय में राष्ट्रवाद और कविता का बीजारोपण इसी प्रांगण में हुआ और बाद में दिनकर बने।

राष्ट्र गौरव इस पाठशाला के पांच वर्ग कक्ष वाले पुराने बिल्डिंग के बगल में एक और खपरैल भवन था, जिसे धरोहर के रूप में सहेजा जा सकता था। लेकिन राजनीतिक कारणों से उसे विलोपित कर दिया गया। आज विज्ञान बहुत आगे है, खोजे तो विद्यालय भवन की दीवारों पर दिनकर की हस्तरेखा और पदचिन्ह जरूर मिलेंगे। दिनकर की सोंधी महक दिनकर के साहित्य से जुड़े लोगों की स्मृति में है, तीर्थ स्थल बनाने का प्रयास वर्षों से किया जा रहा है। लेकिन सरकारी अव्यवस्था के कारण कोई सफलता नहीं मिल रही है, सहेजने में कोई सहयोग नहीं मिल रहा है।

सरकार और दिनकर के नाम पर राजनीतिक रोटी सेकने वाले, लंबे कुर्ते वाले स्मृति को सहेज कर तीर्थ स्थल बनाने में सहयोग करें तो यह राष्ट्रीय स्तर का स्मारक और धरोहर बन सकता है। तुलसीदास के रामायण की तरह दिनकर की रचना इतिहास में पढ़ी-सुनी जाएगी। इस विद्यालय के सैकड़ों बच्चों को आज भी दिनकर की सैकड़ों पंक्तियां याद है, लेकिन हालत यह है कि ”जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता है।” हालांकि हम लोगों ने भी प्रण कर रखा है कि ”लोहे के पेड़ हरे होंगे तू गान प्रेम का गाता चल, नम होगी यह मिट्टी जरूर आंसू के कण बरसात चल।”

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