भारत के ऋषि-मुनियों ने संपूर्ण विश्व को अपने ज्ञान से प्रकाशित किया था : विरेंद्र साहू

 रांची : विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री विरेंद्र साहू ने कहा कि अपने उत्कर्ष काल में भारत के तपस्वी ऋषि-मुनियों ने संपूर्ण विश्व को अपने ज्ञान के प्रकाश से आलोकित किया था। जड़ चेतन में उसी एक ब्रह्म का दर्शन करने वाले तथा सर्वमंगल की कामना से लोक हित में ही मानव जीवन की सार्थकता की अनुभूति करने वाले तपस्वियों ने सत्य, अहिंसा, न्याय, उदारता, क्षमा, सेवा, संयम जैसे मानवीय आदर्शों एवं श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को स्थापित की थी। इस पावन भारतभूमि में सभी मत, पंथ व संप्रदाय का दर्शन भी इन्हीं उत्कृष्ट अवधारणाओं पर आधारित रहा है। साहू ने सोमवार को विश्व हिंदू परिषद के 57वीं स्थापना दिवस (11अगस्त,2020 )के पूर्व विश्व हिंदू परिषद स्थापना, विस्तार एवं उपलब्धियां पर बोल रहे थे। उन्होेंने कहा कि मध्यकाल में बार-बार अनेक विदेशी विधर्मी, क्रूर आक्रांताओं ने बर्बर प्रहारों को झेलता हुआ हमारा राष्ट्र परतंत्रता की बेड़ियो में जकड़ गया।
परिणामस्वरूप हिंदू समाज अपने महान आदर्शों को भुलाकर नानाविध भेद-भाव, कुरीतियों एवं विखंडन का शिकार हुआ। स्वाधीनता के बाद अपने देश का नेतृत्व सेक्युलर विचारधारा का था। ईसाई व मुसलमान तुष्टिकरण और हिंदू समाज पर अन्याय हो रहा था। धर्मांतरण व गोवध आदि की घटनाओं से हिंदू समाज मर्माहात था। साधु – संत एवं हिंदुत्वनिष्ट व्यक्तित्व चिंतित हो गए थे। उन्हें हिंदू समाज के संगठन और जागरण के संदर्भ में कुछ करना चाहिए, ऐसा सभी के मन में बातें आने लगी थी। इस समय तक विश्व पटल पर अनेक देश स्वाधीन हो गए थे। उन देशों में रहने वाले हिंदू आशा और विश्वास से स्वाधीन भारत की तरफ देखते थे। परंतु सेक्युलर वादी मानसिकता के कारण विदेशस्थ हिंदुओं की समस्या के संबंध में अपनी सरकार उदासीन थी। इसी बीच त्रिनिदाद के सांसद और व्यवसायी शंभूनाथ कपिलदेव वहांँ के हिंदुओं की समस्याओं के संदर्भ में भारत आए थे। केंद्र सरकार से संपर्क किया, परंतु निराशा हाथ लगी। फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर “गुरुजी” से भेंट की तथा चर्चा की। चर्चा का सकारात्मक पहलू सामने आया। पूज्य गुरुजी के इच्छा अनुसार संघ के प्रचारक तथा हिंदुस्थान समाचार के संपादक दादा साहब आपटे ने धर्माचार्य, विचारक, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क कार्य प्रारंभ किया।
29 अगस्त,1964 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर चिन्मय मिशन के संस्थापक पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी के सांदीपनी साधनालय, पवई, मुंबई में बैठक हुई। बैठक में परम पूज्य गुरुजी, दादासाहेब आपटे, पूज्य स्वामी चिन्मयानंद जी, पूज्य राष्ट्रसंत टुकड़ोंजी महाराज, अकाली दल के मास्टर तारा सिंह, पूज्य स्वामी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी महाराज, जैन संत सुशील मुनिजी महाराज, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, गीता प्रेस के संस्थापक भाई हनुमान दास पोद्दार सहित अनेक साधु-संतों एवं हिंदू विचारक उपस्थित थे। सभी ने भारत के साथ विदेश में रह रहे हिंदुओं की समस्या, सरकारी नीति के कारण हिंदुओं पर हो रहे अन्याय आदि विषयों पर चर्चा की तथा निराकरण के लिए संवत 2021, युगाब्द 5066, तदनुसार 29 अगस्त 1964 को विश्व हिंदू परिषद की स्थापना हुई। आज विश्व हिंदू परिषद संपूर्ण हिंदू समाज का विश्वव्यापी धार्मिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक संगठन है। आज 80 देशों में सम्पर्क, 25 देशों में विहिप की समिति है। संगठन का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित और जागृत करना है। हिंदू समाज के स्वत्वों, मानबिंदूओं और जीवनमूल्यों की रक्षा और संवर्धन करना तथा विदेशस्थ हिंदुओं से संपर्क स्थापित करना और सुदृढ़ बनाना तथा उनकी सहायता करना है। विश्व हिंदू परिषद की प्रथम सम्मेलन 22, 23 व 24 जनवरी,1966 को प्रयाग के कुंभ के अवसर पर हुआ था। जिसमें 12 देशों के 25,000 प्रतिनिधि उपस्थित थे। 300 प्रमुख संत सहभागी हुए थे। पहली बार प्रमुख शंकराचार्य एक ही मंच पर एकत्रित आए थे। यहाँ विश्व हिंदू परिषद की प्रबंध समिति की घोषणा हुई। मैसूर राजा चामराज जी बाड़ियार अध्यक्ष तथा दादा साहब आपटे महामंत्री हुए। इस सम्मेलन में परावर्तन को मान्यता देने, गोरक्षा, विदेशस्थ हिन्दुओं का संगठन और उनकी सहायता विषय पर ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ। विश्व हिंदू परिषद का बोध वाक्य तय हुआ “धर्मो रक्षति रक्षित:” तथा बोधचिन्ह तय हुआ “अक्षय वटवृक्ष”। 13-14 दिसंबर, 1969 को उड्डुपी, कर्नाटक में हिंदू सम्मेलन किया गया। इस सम्मेलन में सभी धर्माचार्य एवं शंकराचार्य ने मिलकर “हिन्दव: सोदरा: सर्वे, न हिन्दू: पतितो भवेत्” का उद्घोष किया। सम्मेलन में सामाजिक समरसता को ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ तथा सभी ने संकल्प लिया “मम दीक्षा हिन्दू रक्षा, मम मंत्र समानता।” 27,28 व 29, जनवरी 1979 को प्रयाग में द्वितीय विश्व हिंदू सम्मेलन संपन्न हुआ। जिसमें 18 देशों के 60,000 प्रतिनिधि सहभागी की।
इस सम्मेलन का उद्घाटन पूज्य दलाई लामा ने किया था तथा उनका स्वागत पूज्य ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य ने किया। 1982 में मीनाक्षीपुरम में धर्मांतरण के विरुद्ध व्यापक जन जन जागरण अभियान चलाया गया।1983 में एकात्मता यात्रा निकाली गयी जिसमें 6करोड़ लोग सहभागी हुए। अप्रैल1984 में नई दिल्ली के विज्ञान भवन में प्रथम धर्म संसद का अधिवेशन संपन्न हुआ, जिसमें श्रीरामजन्मभूमि, श्रीकृष्णजन्मभूमि तथा काशी विश्वनाथ मंदिर की मुक्ति का प्रस्ताव पारित हुआ। 1984 में सीतामढ़ी से श्रीरामजानकी रथयात्रा का शुभारंभ हुआ। इस यात्रा की सुरक्षा के निमित्त बजरंग दल गठन हुआ। 1986 में श्री रामजन्मभूमि का ताला खुलवाया गया। 1986 में रांची के विराट हिंदू संगम में धर्मांतरण के विरुद्ध प्रस्ताव पारित हुआ। 1989 में अयोध्या में शिलान्यास कराया गया। 30 सितंबर से 9 नवंबर, 1979 तक शिला पूजन का व्यापक कार्यक्रम संपन्न कराया गया जिसमें लगभग तीन लाख जगह यह कार्यक्रम संपन्न हुए तथा करोड़ों लोग सहभागी बने। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में प्रथम कार सेवा हुई। मुलायम सिंह सरकार द्वारा निहत्थे कारसेवकों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गई परंतु कारसेवकों ने विवादित ढांचे पर भगवा ध्वज फहराया। 4 अप्रैल 1991 को दिल्ली वोट क्लब में विराट हिंदू सम्मेलन हुआ। द्वितीय कार्य सेवा में लाखों कारसेवक अयोध्या में एकत्रित हुए और 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा को ध्वस्त कर कच्चे स्वरूप में श्रीराम मंदिर का निर्माण हुआ। 1994 में बिहार झारखंड में महर्षि बाल्मीकि एवं सिद्धू कान्हू रथ यात्रा निकाली गई।1995 में द्वितीय एकात्माता यात्रा निकाली गई। 1996 में कश्मीर में उग्रवादियों के विरोध करने पर बजरंग दल ने अमरनाथ यात्रा करने का आह्वान किया था। जिसमें देशभर से लाखों कार्यकर्ता पहुंचे थे। 1998 में गोरक्षा आंदोलन के तहत नाका लगाकर हजारों गोवंश को बचाया गया। 2001 में श्रीराम नाम जप अभियान के तहत विजय महामंत्र “श्री राम जय राम जय जय राम” का जाप वृहद पैमाने पर किया गया। विजय महामंत्र के 13-13 कोटि जाप से सिद्ध क्षेत्र बनाए गए। 2002 में शीला दान का कार्यक्रम एवं दिल्ली में संत चेतावनी यात्रा हुई।
2004 में श्री राम जानकी विवाह बरात यात्रा निकाली गई। 2005 में बजरंग दल के द्वारा बूढ़ा अमरनाथ यात्रा शुभारंभ की गई। 2007 में श्री राम सेतु रक्षा आंदोलन प्रारंभ हुआ, सारे देश में अगस्त मास के रामेश्वरम राम सेतु रक्षा मंच का गठन हुआ। 12 सितंबर को देशव्यापी चक्का जाम किया गया। जिसमें लाखों लोग सहभागी हुए। राम सेतु रक्षा के लिए 30 दिसंबर 2007 को नई दिल्ली में 10,00,000 लोगों की महासम्मेलन हुआ। जिससे केंद्र सरकार को पीछे हटना पड़ा। 11, 12 व 13 फरवरी, 2007 को अर्ध कुंभ मेले के अवसर पर तृतीय विश्व हिंदू सम्मेलन प्रयाग में संपन्न हुआ। सम्मेलन में भारत के सभी प्रांतों के साथ-साथ विदेश के 14 देशों से प्रतिनिधि आए कुल 41,000 गांवों के लगभग 1,40,000 प्रतिनिधि महासभा सहभागी हुए। इसके अलावा गंगा रक्षा आंदोलन भी हुआ। 2009 में बाबा अमरनाथ श्राइन बोर्ड भूमि आवंटन प्राप्त करने के विरोध आंदोलन हुआ। 2010 में हनुमत शक्ति जागरण अभियान चलाया गया। 2011 में प्रस्तावित सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक का जोरदार विरोध किया गया। 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद कोर्ट का फैसला को रोक लगाई।16 अक्टूबर 2019 को अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी हुई। उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा गया। 9 नवंबर, 2019 को उच्चतम न्यायालय के 5 जजों की बेंच ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया जिसमें 2.77 एकड़ विवादित जमीन हिंदू पक्ष को मिली। 25 मार्च, 2020 को 28 साल बाद रामलला टेंट से निकलकर लकड़ी के मंदिर में शिफ्ट हुए। विहिप द्वारा देश के पवित्र स्थलों की मिट्टी व जल संग्रह कर सरकार द्वारा गठित श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रष्ट के तत्वाधान व प्रधानमंत्री के गरिमयी उपस्थिति में 5 अगस्त 2020 को राम मंदिर का भूमि पूजन कार्यक्रम संपन्न हुआ।
इन कार्यक्रमों में विहिप का अहम भूमिका रही है। विश्व हिंदू परिषद के तत्वाधान में श्री रामोत्सव, श्री हनुमान जयंती, श्री सीता नवमी, अखंड भारत दिवस, विश्व हिंदू परिषद स्थापना दिवस, दुर्गाष्टमी, हुतात्मा दिवस, सौर्य दिवस, सामाजिक समरसता दिवस, हिंदू सम्मेलन आदि प्रमुख कार्यक्रम है। विश्व हिंदू परिषद आज समस्त हिंदू समाज के सभी मत, पंथ, संप्रदाय तथा सभी जातियों के स्त्री-पुरुष को सशक्त, संगठित और सुरक्षित करने का कार्य कर रही है। सेवा, सुरक्षा व संस्कार मुख्य ध्येय है। इस पावन भारत भूमि से धर्मांतरण, गोवध, मान बिंदुओं के अपमान, जिहादी आतंकवाद, सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता सहित अन्य सभी कुरितियों को निर्मूल कर एकजुट, समरस, जागरूक एवं शक्तिशाली हिंदू समाज और गौरवशाली राष्ट्र का पुनर्निर्माण करना मुख्य लक्ष्य है।

 

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