लखनऊ का वो हनुमान मंदिर जिसे एक बेगम ने बनवाया, और जिसका मेला एक हाथी ने शुरू करवाया

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लखनऊ के अलीगंज मोहल्ले में एक ऐसा प्राचीन हनुमान मंदिर है, जो सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता की एक ऐसी जीती-जागती मिसाल है, जिसे सुनकर दिल खुश हो जाता है. यहाँ हर साल ज्येष्ठ के महीने में लगने वाला "बड़े मंगल" का मेला किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि पूरे लखनऊ का त्योहार होता है. इस मेले में हर धर्म के लोग एक साथ मन्नतें मांगते, प्रसाद चढ़ाते और भंडारे का आनंद लेते हैं.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मशहूर मंदिर की नींव एक मुस्लिम बेगम के सपने और एक ज़िद्दी हाथी की वजह से पड़ी थी?

बेगम का सपना और ज़मीन से निकली मूर्ति

कहानी शुरू होती है अवध के नवाब मोहम्मद अली शाह की बेगम से. कहते हैं कि उन्हें संतान नहीं हो रही थी. किसी की सलाह पर वह एक फकीर के पास गईं और उनकी मुराद पूरी हो गई. एक रात गर्भवती बेगम ने एक अजीब सपना देखा. सपने में उनके गर्भ में पल रहे बच्चे ने उनसे कहा कि इस्लामबाड़ी नाम की जगह पर ज़मीन के नीचे हनुमान जी की एक मूर्ति दबी है, उसे निकालकर स्थापित करवाओ.

बेगम ने फौरन नवाब को यह बात बताई. टीले की खुदाई करवाई गई, और सचमुच वहां से हनुमान जी की एक बेहद सुंदर मूर्ति निकली.

जब एक हाथी ने तय किया मंदिर का स्थान

मूर्ति को साफ़ करके, हीरे-जवाहरात से सजे एक हौदे में रखकर हाथी पर बैठाया गया. शाही काफिला मूर्ति को गोमती नदी के पार ले जाने के लिए निकला. लेकिन जैसे ही हाथी आज के अलीगंज वाली जगह पर पहुंचा, वह अचानक रुक गया. महावत ने बहुत कोशिश की, लेकिन हाथी टस से मस न हुआ.

जब भी हौदे को उतारा जाता, हाथी चलने लगता, लेकिन हौदा रखते ही वह फिर बैठ जाता. तब एक साधु ने बेगम को समझाया कि शायद हनुमान जी गोमती के पार नहीं जाना चाहते. बेगम ने भगवान की इच्छा का सम्मान किया और उसी स्थान पर मूर्ति स्थापित करवाकर एक शानदार मंदिर बनवा दिया.

मेले की शुरुआत की दिलचस्प कहानियां

मंदिर तो बन गया, लेकिन मेले की शुरुआत कैसे हुई, इसे लेकर भी दो बड़ी दिलचस्प कहानियां हैं.

  • पहली कहानी (महामारी से जुड़ी): मंदिर बनने के कुछ साल बाद, इलाके में प्लेग की भयानक महामारी फैल गई. हज़ारों लोग पुराने मंदिर में मदद मांगने पहुंचे. तब वहां के पुजारी को सपना आया कि हनुमान जी कह रहे हैं, "मेरी शक्ति उस नए मंदिर में है, जिसे बेगम ने बनवाया है. लोगों से कहो कि वहां जाएं." जब भीड़ नए मंदिर में पहुंची, तो चमत्कार की तरह लोग ठीक होने लगे. बस, उसी दिन से यहां मेला लगने लगा.
  • दूसरी कहानी (बेगम की मन्नत से जुड़ी): दूसरी कहानी के मुताबिक, नवाब वाजिद अली शाह की दादी, आलिया बेगम, एक बार बहुत बीमार पड़ीं. उन्होंने इसी मंदिर में अपनी अच्छी सेहत के लिए मन्नत मांगी. जब वह ठीक हो गईं, तो उन्होंने बहुत बड़ा उत्सव मनाया और गरीबों में लाखों रुपये बांटे. कहते हैं, तभी से इस मेले की परंपरा शुरू हुई और उन्हीं के नाम पर इस मोहल्ले का नाम अलीगंज पड़ा.

आज भी इस मंदिर का महत्व इतना है कि देश में कहीं भी हनुमान जी का नया मंदिर बनता है, तो उसकी मूर्ति के लिए पहला पोशाक और सिंदूर यहीं से भेजा जाता है. यह मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि लखनऊ की उस गंगा-जमुनी तहजीब की आत्मा है, जो सदियों से दिलों को जोड़ती आई है.