अंग्रेजो को भगाने की पहली योजना बनाई गयी थी इस मंदिर में,औघड़ नाथ के नाम से फेमस है ये मंदिर !!

1857 की क्रांति से ही शुरुआत हुई थी अंग्रजो को भगाने की इस औघड़ नाथ के मंदिर में ही क्रांति को पहल देने की योजना बनी थी। पहले इस मंदिर को काली पलटन के नाम से जाना जाता है  लेकिन अब इस मंदिर को औघड़ नाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है काली पलटन पहले फौज की टुकड़ी को कहा जाता था। 
 
 
यह टुकड़ी अंग्रेजो की रेजिमेंट की टुकड़ी थी इस मंदिर में सारे सवतंत्रता सेनानी इसी मंदिर में अंग्रजो को भगाने की योजना बनाते थे यह पर हाथी वाले बाबा नाम से एक व्यक्ति आता था। 
 
 
जो सैनिको में अंग्रेजो के विरुद्ध भड़काता था और सैनिको में देश प्रेम की भावना जागृत करता था और उन्होंने ने ही बताया था की जो कारतूस वो काम में लेते है उनमे गाय की चर्बी भरी हुई है। 

 
कहते है ये व्यक्ति  धूधूपंत नाना साहब थे।और इनकी भड़कायी हुई आग जंगल की आग की तरह चारो तरफ फ़ैल गयी। 
 
 
 और 24 अप्रैल 1857 को कई पलटन के जवानो ने चर्बी वाले कारतूसों को काम में लेने से मना करदिया लेकिन अंग्रेज सरकार ने उन सैनिको को बंदी बना लिया। 
 
 
फिर अंग्रेज सरकार ने काली पलटन के सैनिको के बे इज्जत करने की कोशिश की और उनके कपडे सबके सामने उतारे और उन्हें बेड़िया पहनाई  गयी और उन 85 सैनको को मेरठ की विक्टोरिया पार्क स्थित नई जेल में रखा गया।

इससे उनमे अंग्रेजो के प्रति विरोध की भावना जग उठी जब ये बात अंग्रेजी के  कर्नल फिनिंश  को पता चली तो उन्होंने देसी और अंग्रजी सैनिको को इकट्ठा किया। 
 
 
 
 उनका उदेशय भारतीय सैनिको को परेड में उलझाकर रखना थाइसी दौरान किसी घुड़सवार ने उन्हें सुचना दी की कई पलटन के सैनिको ने पुरे गोला -बारूदों पर कब्ज़ा कर लिया है बस इतना सुनते ही भारतीय सैनिको ने  कर्नल फिनिंश पर गोलिया चलना शुरू कर दिया। 
 
                         
 सभी अंग्रेज सैनिक जान बचाकर भागने लगे और वह पर खड़े सभी अंग्रेज अधिकारियो को मर दिया गया फिर जेल में बंद सभी 85 सैनिको को छुड़ा लिया गया था इस तरह इस मंदिर से ही आजादी की पहल हुई थी। 

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