देश के बड़े कृषि वैज्ञानिक बोले- मशीनों को दोस्त बनाएं किसान, होगा फायदा और बढ़ेगी कमाई

कृषि क्षेत्र (Agriculture Sector) में मशीनों को इस्तेमाल से एक बड़ा बदलाव आया है. खेती-किसानी (Farming) के काम में मशीनों के उपयोग के कारण ही उत्पादका में बढ़ोतरी हुई है. समय पर बुवाई-रोपाई का काम हो रहा है. कृषि कार्य अकेले नहीं किया जा सकता. इसमें मजदूरों की जरूरत पड़ती है. लेकिन मशीनों के कारण ही मजदूरों की कमी और महंगे लेबर चार्ज से किसानों को राहत मिली है. यहीं कारण है कि वैज्ञानिक किसानों (Farmers) से मशीनों के उपयोग को बढ़ाने की सलाह देते रहते हैं. देश के बड़े कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर अरुण कुमार जोशी ने कहा कि किसानों को मशीनों से दोस्ती करनी होगी. इससे उन्हें फायदा होगा और कमाई में बढ़ोतरी होगी.

 

डॉक्टर जोशी ने कहा कि देश में पारंपरिक तरीके से खेती करने वाले किसान अब आधुनिक तकनीकि को अपना रहे हैं. नई मशीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं. महाराष्ट्र के पालघर जिले की बात करते हुए बताया कि वहां के आदिवासी वर्षों पुरानी खेती की पद्धति से अपना जीवन यापन करते थे लेकिन तकनीकि ने उनके जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन ला दिया है. अब बीज बोने के लिए ज्यादा मजदूरों की जरुरत नहीं पड़ती. जुताई के साथ ही बुआई के लिए भी मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है.

मशीनों से ही समाप्त होगी पराली की समस्या

मशीनों से होने वाली कटाई के कारण देश में पराली एक बड़ी समस्या बन गई है. इससे पर्यावरण के साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है. डॉ जोशी कहते हैं कि पराली की समस्या को समाप्त करने के लिए आज मशीन मौजूद है, जिसके इस्तेमाल से किसानों को कई तरह के फायदे हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि आज के समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान इन मशीनों का इस्तेमाल कर लाभ ले रहे हैं.

वर्तमान में डॉ अरुण कुमार जोशी बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA) के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. कृषि जगत के बड़े वैज्ञानिक, हरित क्रांति के जनक और नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित डॉ नॉर्मन ई बोरलॉग पर इस संस्था का नामकरण किया गया है. यहां यह बताना उचित होगा कि डॉ बोरलॉग को भारत सरकार ने 2006 में पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा था.

गेहूं और मक्का पर संस्था का विशेष ध्यान

13 साल से बीसा से जुड़े प्रोफेसर डॉ जोशी  कहते हैं कि क्लाइमेट चेंज के कारण फसलों में आए परिवर्तन और उसके साथ बदलाव पर सबसे अधिक फोकस किया जा रहा है. बीसा के तीन प्रमुख रिसर्च सेंटर पंजाब के लुधियाना, मध्य प्रदेश के जबलपुर और बिहार के समस्तीपुर जिले में चल रहे हैं. इनमें गेहूं और मक्का पर रिसर्च हो रहा है. इस दोनों फसलों पर ही हमारे लाखों किसानों की जिंदगी टिकी रहती है, इसलिए इन फसलों के जीन में क्या-क्या सुधार किया जाए और कैसे किसानों को लाभकारी बनाया जाए, इस पर काम चल रहा है.

Arun Kr Joshi Md Borlog

बीसा के प्रबंध निदेशक डॉ अरुण कुमार जोशी

अब दलहन और तिलहन पर भी रिसर्च कर रहा बीसा

बीसा के प्रबंध निदेशक डॉ जोशी कृषि जगत में तकनीक की अहम जरूरत बताते हैं. उन्होंने कहा कि पूरे संसार में कोरोना महामारी ने व्यापक असर डाला, लेकिन भारत के किसानों की वजह से कृषि क्षेत्र पर इसका असर नहीं पड़ा. उन्होंने कहा कि अब हमारे सामने खादान्न की कमी नहीं है बल्कि अधिकता है, लेकिन खाद्य तेल के लिए अभी भी हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं. हम अब मक्के और गेहूं के साथ तिलहन और दलहन पर रिसर्च कर रहे हैं, जिनके परिणाम भी सुखद हैं.

जोशी के मुताबिक बांग्लादेश में गेहूं में भयानक रोग लगा, उसका निदान भी बिसा ने ही किया. दक्षिण एशिया के तमाम देशों में कृषि में होने वाली जेनेटिक बीमारियों पर भी शोध किया जा रहा है, ताकि वहां की फसलों में समय के साथ आ रहे बदलाव के आधार पर सुधार किया जा सके.

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