रोगों से धान के बचाव के लिए दवाओं का समय से करें छिड़काव

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कानपुर, 21 सितम्बर (हि.स.)। मौसम को देखते हुए धान की फसल में रोग एवं कीट के बढ़ने की प्रबल संभावनाएं हैं। ब्लास्ट या झोंका रोग में धान की पत्तियां तथा डंठल दोनों प्रभावित होते हैं, जिससे पूरा पौधा गहरे रंग का होकर झुलस जाता है। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर कार्बेंडाजिम पचास प्रतिशत दवा एक किलोग्राम अथवा छह सौ ग्राम ट्राईसाईक्लाजोल दवा एक हजार लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। यह जानकारी गुरुवार को सीएसए के पादप रोग विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. एस के विश्वास ने दी।

उन्होंने कहा कि इसलिए किसान भाई रोग एवं कीट की अच्छी तरह पहचान कर उचित दवाओं का प्रयोग करें। समय से बचाव न कर पाने की स्थिति में 35 से 40 प्रतिशत तक किसान भाइयों को नुकसान उठाना पड़ता है। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के पादप रोग विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष ने बताया कि मौसम को देखते हुए धान की फसल में रोग एवं कीट के बढ़ने की प्रबल संभावनाएं हैं।

इसलिए किसान भाई रोग एवं कीट की अच्छी तरह पहचान कर उचित दवाओं का प्रयोग करें। झुलसा रोग के लगने से धब्बों का रंग पुआल जैसा हो जाता है। खेत में नमी या सूखे की स्थिति में हल्दिया रोग से बालियों के दाने पीले आभामंडल से घिरे रहते हैं। इसके उचित नियंत्रण के लिए बाली निकलने की अवस्था में प्रॉपिकॉनाजोल 1.5 ग्राम दवा 800 से 1000 लीटर पानी में घोलकर बनाकर छिड़काव करें।

विश्वविद्यालय के मीडिया प्रभारी डॉ. खलील खान ने किसानों को सचेत करते हुए बताया कि धान की इस अवस्था में गंधी कीट, तना छेदक एवं फुदका कीट प्रमुख हैं। जिनके लगने पर पैदावार प्रभावित होती है। गंधी कीट के उचित नियंत्रण के लिए फूल आने की अवस्था में मिथाइल पेराथियोन 2प्रतिशत धूल 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करें। तना छेदक के नियंत्रण के लिए कारटॉप हाइड्रोक्लोराइड 54प्रतिशत, 18 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 3.5 सेंटीमीटर धान के खेत में खड़े पानी में प्रयोग करें। फुदका कीट के नियंत्रण के लिए कार्बाेफीरोन 3जी, 20 किलो ग्राम या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 0.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव कर किसान अपने धान की फसल का बचाव कर सकते हैं।

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