कर्ज नहीं चुकाया तो सरेआम चौराहों पर टांग दी जाएगी तस्वीर! जैसलमेर को-ऑपरेटिव बैंक ने लिया फैसला
राजस्थान के सरहदी और ऐतिहासिक जिले जैसलमेर से बैंकिंग सेक्टर और कर्जदारों से जुड़ी एक बेहद अनोखी, हैरान करने वाली और बहुत बड़ी खबर सामने आ रही है। जैसलमेर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक (Jaisalmer Central Cooperative Bank) ने लंबे समय से लोन लेकर बैठे और बार-बार चेतावनी के बावजूद पैसा वापस न करने वाले बकायेदारों (Defaulters) के खिलाफ अब तक का सबसे कड़ा और बड़ा फैसला ले लिया है। कूटनीतिक और आर्थिक नजरिए से देखें तो बैंकों के बढ़ते एनपीए (NPA) को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया यह कदम बेहद आक्रामक माना जा रहा है। बैंक प्रबंधन ने साफ एलान कर दिया है कि यदि तय समय सीमा के भीतर कर्ज की राशि नहीं चुकाई गई, तो संबंधित डिफॉल्टर्स की तस्वीरें और उनका पूरा ब्यौरा शहर के मुख्य और व्यस्त चौराहों पर सरेआम बैनर-पोस्टर के जरिए प्रदर्शित कर दिया जाएगा। बैंक के इस अप्रत्याशित फैसले के बाद से ही जिले के बड़े और शातिर कर्जदारों के खेमे में भारी हड़कंप मच गया है।
लाखों का लोन डकार कर बैठे बड़े बकायेदारों की अब सरेआम की जाएगी सामाजिक मुनादी
जैसलमेर को-ऑपरेटिव बैंक के प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, जिले के हजारों किसानों, व्यापारियों और रसूखदार लोगों ने कृषि कार्य, व्यवसाय और अन्य व्यक्तिगत जरूरतों के लिए बैंक से करोड़ों रुपये का कर्ज ले रखा है। इनमें से एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो बार-बार बैंक द्वारा भेजे जा रहे लीगल नोटिस और समझौता शिविरों (Loan Settlement Camps) के बावजूद जानबूझकर लोन की किस्तें जमा नहीं कर रहा है। बैंक का मानना है कि इस तरह के विलफुल डिफॉल्टर्स (Willful Defaulters) के कारण बैंक की वित्तीय स्थिति पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। अब ऐसे लोगों को सबक सिखाने और उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए बैंक ने उनकी तस्वीरें सार्वजनिक चौराहों, ग्राम पंचायत भवनों और प्रमुख सरकारी दफ्तरों के बाहर चस्पा करने का यह अनोखा रास्ता चुना है।
बैंक की इस कड़े 'नेम एंड शेम' नीति से डिफॉल्टर्स के सामाजिक रसूख पर लगेगा तगड़ा झटका
बैंकिंग विशेषज्ञों का कहना है कि जैसलमेर को-ऑपरेटिव बैंक द्वारा अपनाई जा रही इस कड़क नीति को 'नेम एंड शेम' (Name and Shame Policy) कहा जाता है। इसके तहत कर्जदारों को कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा का भी डर दिखाया जाता है। जैसलमेर जैसे पारंपरिक और सामाजिक रूप से जुड़े जिले में किसी भी व्यक्ति की तस्वीर का चौराहे पर बतौर 'कर्जचोर' या 'डिफॉल्टर' लगना उसके और उसके परिवार के सामाजिक रसूख के लिए एक बहुत बड़ा और असहनीय झटका साबित हो सकता है। बैंक प्रशासन का इरादा साफ है कि जो लोग कानून और अदालती नोटिस से नहीं डर रहे हैं, वे समाज में होने वाली बदनामी के डर से तुरंत बैंक का पैसा वापस करने के लिए दौड़ पड़ेंगे।
बैंक अधिकारियों ने तैयार की डिफॉल्टर्स की पहली ब्लैक लिस्ट, कभी भी शुरू हो सकता है पोस्टर वार
इस ऐतिहासिक फैसले को जमीन पर अमलीजामा पहनाने के लिए जैसलमेर को-ऑपरेटिव बैंक की विभिन्न शाखाओं ने अपने-अपने स्तर पर बड़े और क्रॉनिक डिफॉल्टर्स की सूची तैयार कर ली है। बैंक के प्रबंध निदेशक (MD) ने बताया कि इस सूची में शामिल लोगों को एक अंतिम अवसर (Last Warning Call) दिया जा रहा है। यदि दी गई आखिरी मोहलत के भीतर बकायेदार अपने खातों को नियमित नहीं करते हैं या एकमुश्त समझौता योजना के तहत लोन चुकता नहीं करते हैं, तो बिना किसी पूर्व सूचना के उनकी तस्वीरें प्रिंट करवाकर चौराहों पर लगवा दी जाएंगी। इसके साथ ही, बैंक रिकवरी टीमें (Recovery Teams) पुलिस बल के सहयोग से उनके घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर ढोल-नगाड़े बजाकर कुर्की और जब्ती की कार्रवाई भी तेज करने जा रही हैं।
जैसलमेर के किसान संगठनों और आम जनता के बीच इस फैसले को लेकर छिड़ गई बड़ी बहस
बैंक के इस बेहद सख्त और आर-पार वाले फैसले के बाद जैसलमेर के स्थानीय समाज और किसान संगठनों के बीच एक नई और गरमा-गरम बहस छिड़ गई है। जहां एक तरफ आम नागरिकों और बैंक के ईमानदार खाताधारकों ने इस कदम का पुरजोर स्वागत किया है और कहा है कि जनता के पैसे को दबाकर बैठने वालों के साथ ऐसा ही होना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ कुछ किसान नेताओं ने इस पर आंशिक आपत्ति भी जताई है। किसान संगठनों का कहना है कि लगातार पड़ रहे सूखे और प्राकृतिक आपदाओं के कारण जो गरीब किसान कर्ज नहीं चुका पाए हैं, उनके साथ इस तरह का व्यवहार अमानवीय होगा और बैंक को बड़े व्यापारिक डिफॉल्टर्स और छोटे मजबूर किसानों के बीच अंतर स्पष्ट करना चाहिए। बहरहाल, बैंक ने साफ कर दिया है कि नियम सबके लिए समान हैं और रिकवरी अभियान बिना किसी भेदभाव के जारी रहेगा।