कविता

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आग फैली नफ़रतों की प्रेम से भी लगता डर है _
किस पर विश्वास करें चहुं और स्वार्थ की डगर है _!

मौत की अठखेलियाँ हादसों के सिलसिले हैं _
मुट्ठी भर लोगों की चालें ईमान बिकता हर शहर है _!

उमींदो की किश्ती को कभी डुबोया नहीं करते _
दूर मंज़िल देख कर होंसला कभी हारा नहीं करते _!

जज़्बा आसमान छूने का जो रखते हैं ज़िंदगी में_
जोखिम भरा समय है निराश बैठा नहीं करते_!

ज़िंदगी में तपिश का होना भी ज़रूरी है _
सोने का भट्ठी में तपकर निखरना भी ज़रूरी है _!

जोखिम भरा समय है सोचकर मत घबराओ तुम_
जुनून दिल में जीत का जगाना भी तो ज़रूरी है _!

विघ्न बाधा न हो ज़िंदगी में ख़ाक मज़ा है जीने में _
थम जाएगा तूफ़ाँ भी जब आग लगी हो सीने में _!

माना सच की राह पर मुश्किलें भी होंगी बहुत _
मंज़िल मिलेगी ज़रूर ख़ुशियाँ भी मिलेंगी बहुत_!!

कमलेश अरोरा
दिल्ली

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