पितृ पक्ष 2021: जानिए स्वर्ग और नरक से अलग उस जगह के बारे में जहां पितर रहते हैं?

हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है. पितृ पक्ष के दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण किया जाता है. पितरों को लेकर हर राज्य में कई तरह की कहानियां कही जाती हैं. कहा जाता है कि पितृ पक्ष में दान आदि करने से पितरों को शांति मिलती है. ऐसे में पितृ पक्ष के दौरान जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर पितरों को लेकर क्या कहानियां और यह पितर रहते कहां हैं…

पहले आपको बता दें कि हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद मास में पूर्णिमा दिन से पितृ पक्ष शुरु होता है. इस बार श्राद्ध पक्ष 20 सितंबर से शरू हो गया है जो 06 अक्टूबर 2021 तक चलेगा. इन 15 दिनों तक किसी की तरह का शुभ कार्य नहीं करना चाहिए. पितृ पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए पूजा करनी चाहिए. मान्यता है कि यमराज भी जीवों को मुक्त कर देते हैं ताकि अपने परिजनों से तर्पण ग्रहण कर परिवार के सदस्यों को आशीर्वाद देते हैं.

कहा जाता है कि पुण्य करके पाप से छुटकारा पाया जा सकता है. वहीं, जीवनकाल में अच्छे काम करने वाले व्यक्ति को स्वर्ग में जगह मिलती है और बुरे वक्त करने वाले या पाप करने वाले व्यक्ति को नरक में जगह मिलती है. लेकिन, कई धार्मिक किताबों में एक ऐसी जगह का भी वर्णन मिलता है, जो स्वर्ग और नरक दोनों से अलग होती है. कहा जाता है कि यह वो जगह है, जहां पितर यानी हमारे पूर्वज मोक्ष मिलने वहां ही रहते हैं.

कहां रहते हैं पितर?

हिंदू आख्यानों के जानकार देवदत्त पटनायक अपनी किताब Myth=Mithya में पितरों को लेकर लिखते हैं पितरों के लिए एक अलग जगह है. उन्होंने किताब में लिखा है, नरक का एक निवासी आखिरकार स्वर्ग की ओर से रुख कर सकता है. लेकिन, एक ऐसा स्थान भी है जहां कोई आशा नहीं है. इस जगह को पुत कहा जाता है. यह पितर के लिए आरक्षित है, जो मृत्युलोक में फंसे हैं, जहां पुनर्जन्म की कोई आशा नहीं है.

कैसे रहते हैं?

किताब में चित्र के जरिए समझाया गया है कि पितर पुत लोक में उलटे लटके रहते हैं और उनके पांव रस्सी से ऊपर बंधे होते हैं. हालांकि, हिंदू आख्यान के शब्द विज्ञान के मुताबिक पुरुष रुप के बारे में कहा जाता है कि वह आत्मा और भावना का प्रतिनिधित्व करता है जबकि महिला स्वरूप पदार्थ और शरीर का. बूढ़े पुरुष आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं. वहीं, रस्सी नश्वर शरीर का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे जीव संसार से बंधा हुआ है. कहा जाता है कि अगर धरकी पर उनके सभी वंशज बच्चा पैदा करने से मना कर दें तो वो संसार से कभी भी बाहर नहीं निकल सकते हैं. वे प्रलय तक फंसे रहेंगे.

कब होता है पितरों का पुनर्जन्म?

किताब में लिखा गया है, ‘पुनर्जन्म तभी हो सकता है, जब कोई अपना या वंशज संतति पैदा करे. जो बिना बच्चा पैदा किए मृत्युलोक को सिधार गए, उनके पास धरती पर कोई ऐसा नहीं बचता जो उनके लिए पुनर्जन्म सुनिश्चित कर सके, वे पुत में रहने के लिए बाध्य हैं. इसलिए एक बेटे और बेटी को संस्कृत में पुत्र और पुत्री कहा जाता है, जिसका अर्थ है पुत से मुक्ति दिलाने वाला. एक बच्चे को जन्म देकर व्यक्ति न केवल अपने पुरखों का कर्ज अदा करता है बल्कि पितर को भी मृत्युलोक से जीवलोक में भागने में मदद करता है.

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