समय से पूरा होने पर विकास परियोजनाओं का अर्थव्यवस्था और परिस्थितिकी दोनों को मिलता है लाभ: प्रधानमंत्री

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नई दिल्ली, 23 सितंबर (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि विकास परियोजनाओं को समय से पूरा कर लिए जाने से अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी दोनों को लाभ मिलता है। अर्बन नक्सल और विकास में बाधा डालने वाले ग्लोबल इंस्टिट्यूशन के प्रति सजग करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि कार्य पद्धति में बदलाव लाकर विकास परियोजनाओं को जल्द अनुमति दी जानी चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से गुजरात के एकता नगर में पर्यावरण मंत्रियों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया।

प्रधानमंत्री ने विकास परियोजनाओं से पर्यावरण को होने वाले लाभ के कुछ उदाहरण देते हुए बताया कि इनसे किस प्रकार कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है। उन्होंने कहा कि दिल्ली के प्रगति मैदान में बनी टनल से ही सालाना 13 हजार टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आधुनिक ढांचागत सुविधाओं के बिना देश का विकास और देशवासियों के जीवन के स्तर में सुधार लाने के प्रयास सफल नहीं हो सकते। सालों तक देश में पर्यावरण अनुमति के नाम पर आधुनिक ढांचागत सुविधाओं के निर्माण को रोका गया। इसमें अर्बन नक्सल और विकास में बाधा डालने वाले ग्लोबल इंस्टिट्यूशन का बड़ा हाथ रहा था। प्रधानमंत्री ने सरदार सरोवर बांध का उदाहरण दिया और कहा कि यह परियोजना नेहरू जी के काल में शुरू हुई थी लेकिन इस दुष्चक्र के कारण यह उनके कार्यकाल में जाकर पूरी हो पाई।

प्रधानमंत्री ने राज्यों से आग्रह किया कि वह पर्यावरण और वन से जुड़ी अनुमति प्रदान करने में गति लाएं। उन्होंने कहा कि राज्यों में छह हजार विकास परियोजनाएं पर्यावरण और साढ़े छह हजार परियोजनाएं वन विभाग की अनुमति के इंतजार में लंबित पड़ी हैं।

इस संबंध में उन्होंने केंद्र की पहल परिवेश पोर्टल से हो रहे लाभ की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह पोर्टल पर्यावरण से जुड़ी सभी अनुमति के लिए एक सिंगल विंडो माध्यम बना है। यह पारदर्शी है और इससे अनुमति पाने के लिए होने वाली भागदौड़ कम हो रही है। पिछले 8 सालों में पर्यावरण से जुड़ी अनुमति में लगने वाला समय अब 600 दिन से घटकर 75 दिन रह गया है।

प्रधानमंत्री ने अपने उद्बोधन में पर्यावरण के दृष्टिकोण से किए गए सफल प्रयासों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश आज विकसित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है और साथ ही अपनी पारिस्थितिकी को भी मजबूत कर रहा है। देश के वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है और जलाशयों का भी दायरा बढ़ा है। उन्होंने कहा कि जैव विविधता में वृद्धि हो रही है। बीते वर्षों में गिर के शेरों, बाघों, हाथियों, एक सींग वाले गैंडों और तेंदुओं की संख्या में वृद्धि हुई है। कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश में चीता की वापसी हुई है जिससे एक नया उत्साह लौटा है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि 2017 में भारत ने नेट जीरो अर्थात कार्बन उत्सर्जन को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य रखा है। देश का ध्यान अब ग्रीन ग्रोथ और ग्रीन जॉब्स पर है। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हर राज्य के पर्यावरण मंत्रालय की बहुत बड़ी भूमिका है। उन्होंने मंत्रियों से आग्रह किया कि राज्यों में सर्कुलर इकोनॉमी को ज्यादा बढ़ावा दें। इससे ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और एकल उपयोग प्लास्टिक से मुक्ति के अभियान को ताकत मिलेगी।

सहकारी संघवाद की भावना को आगे बढ़ाते हुए गुजरात में पर्यावरण से जुड़ा राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इसका मकसद बेहतर नीतियां बनाने में केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच और अधिक तालमेल बनाना है। इन नीतियों से जुड़े विषय हैं- बहु-आयामी दृष्टिकोण के जरिए प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करना, ‘लाइफ-लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’ पर ध्यान केंद्रित करने के साथ जलवायु परिवर्तन से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए राज्य कार्य योजनाएं, आदि। इसमें डीग्रेडेड भूमि की बहाली और वन्यजीव संरक्षण पर विशेष जोर देने के साथ वन क्षेत्र को बढ़ाने पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

अगल दो दिन 23 और 24 सितंबर को आयोजित होने वाले इस दो दिवसीय सम्मेलन में छह विषयगत सत्र होंगे। इनमें ‘लाइफ’, जलवायु परिवर्तन से निपटना (उत्सर्जन के शमन और जलवायु प्रभावों के अनुकूलन के लिए जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य योजनाओं को अपडेट करना); परिवेश (एकीकृत हरित मंजूरी के लिए सिंगल विंडो सिस्टम); वानिकी प्रबंधन; प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण; वन्यजीव प्रबंधन; प्लास्टिक और अपशिष्ट प्रबंधन जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

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