झारखंड में अब गाँव की सरकार होगी असली सरकार PESA एक्ट पर हेमंत सोरेन का वो फैसला

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News India Live, Digital Desk : आज 31 दिसंबर 2025 है और नए साल 2026 की पूर्व संध्या पर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक ऐसी राजनीतिक और सामाजिक सुगबुगाहट तेज़ कर दी है, जिसका असर प्रदेश की जड़ों तक होने वाला है। सालों से चली आ रही माँग के बाद अब PESA (पेसा) एक्ट यानी 'पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम' के नियमों को सार्वजनिक करने की तैयारी है।

सुनने में शायद ये आपको एक कानूनी नाम लग रहा हो, लेकिन असल में ये झारखंड के हर उस गाँव की कहानी है जहाँ का इंसान अपनी माटी और जंगलों को बचाने के लिए पीढ़ियों से संघर्ष कर रहा है।

क्या है ये PESA एक्ट और क्यों मचा है इतना शोर?

साधारण भाषा में समझें तो 'पेसा' एक्ट अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों को अपनी स्थानीय परंपराओं और संसाधनों (जल, जंगल, जमीन) पर खुद फैसला लेने का हक देता है। इसका सीधा मतलब ये है कि अब ऊपर से थोपे गए नियमों के बजाय गाँव की 'ग्राम सभा' खुद तय करेगी कि उनकी जमीन पर विकास का काम कैसे होगा। यह कानून आदिवासियों की पहचान और उनकी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की एक कानूनी ढाल है।

हेमंत सोरेन की इस मांग के पीछे का मकसद

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन शुरू से ही 'झारखंडी पहचान' की राजनीति के अगुआ रहे हैं। 2026 की दहलीज़ पर खड़े होकर उनका इस कानून के नियमों को सबके सामने लाना ये बताता है कि वे गाँवों को प्रशासनिक और कानूनी रूप से मज़बूत करना चाहते हैं। उनका मानना है कि जब तक नियमों में पारदर्शिता नहीं होगी और आम जनता इसे समझ नहीं पाएगी, तब तक आदिवासियों का असल सशक्तिकरण मुमकिन नहीं है।

इससे आम इंसान की ज़िंदगी में क्या बदलेगा?

  • संसाधनों पर मालिकाना हक: गाँवों में बालू, गिट्टी या अन्य प्राकृतिक संसाधनों के खनन या उपयोग पर ग्राम सभा का सीधा हस्तक्षेप होगा।
  • अधिकार और स्वायत्तता: छोटे-मोटे झगड़ों और विवादों को सुलझाने के लिए पुलिस या कचहरी जाने की जरूरत कम होगी, क्योंकि ग्राम सभा के पास कई विवाद सुलझाने की शक्ति होगी।
  • विस्थापन पर लगाम: अक्सर बड़ी परियोजनाओं की वजह से गाँवों के गाँव उजाड़ दिए जाते थे। अब पेसा एक्ट के तहत बिना ग्राम सभा की मर्ज़ी के आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल करना इतना आसान नहीं होगा।

क्या 2026 में दिखेगा इसका बड़ा असर?

विपक्ष अक्सर पेसा एक्ट के लागू होने में देरी को लेकर सरकार को घेरता रहा है। लेकिन 2025 का अंत होते-होते इस मुद्दे पर सरकार की तेज़ी ये संकेत दे रही है कि आने वाले साल में झारखंड के चुनावी और सामाजिक समीकरण बदल सकते हैं। यह कदम सिर्फ़ एक एक्ट लागू करना नहीं है, बल्कि हेमंत सोरेन द्वारा आदिवासी समुदायों को दिया गया एक 'भरोसा' है कि वे अपने घर में अपनी शर्तों पर जिएंगे।