निक्की प्रधान के गांव में…जश्न का माहौल है:भारतीय महिला हॉकी टीम के सेमीफाइनल में पहुंचने पर खूंटी में जश्न का माहौल, यहीं की बेटी हैं निक्की, पिता ने कहा- टीम जरूर जीतेगी

 

गुलाल लगा ढोल बजा खुशी जाहिर करते निक्की प्रधान के माता-पिता। - Dainik Bhaskar

गुलाल लगा ढोल बजा खुशी जाहिर करते निक्की प्रधान के माता-पिता।

भारतीय महिला हॉकी टीम के ओलिंपिक में पहली बार सेमीफाइनल में पहुंचने पर झारखंड के खूंटी में जश्न का माहौल है। टीम की एक सदस्य निक्की प्रधान का गांव खूंटी का हेसल है। इनके गांव में लोग रंग-गुलाल लगा एक-दूसरे को बधाई देते नजर आए। इस मौके पर निक्की प्रधान के पिता सोमा प्रधान ने कहा- ‘मुझे पूरा विश्वास है कि इस बार टीम जरूर जीतेगी’।

भारत ने क्वार्टर फाइनल में 3 बार की ओलिंपिक चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को 1-0 से हरा दिया। अब सेमीफाइनल में टीम इंडिया का सामना 4 अगस्त को अर्जेंटीना से होगा। इधर, ग्रामीणों ने निक्की प्रधान के घर पहुंचकर उनके पिता सोमा प्रधान और मां जितनी देवी को बधाई दी। निक्की के पिता सोमा प्रधान ने कहा- ‘मुझे आशा ही नहीं विश्वास है कि अबकी बार भारतीय टीम इतिहास रचेगी’।

पिता ने कहा कि टीम में चयन के साथ ही मैंने बेटी को जीत का आशीर्वाद दिया था। आशीर्वाद पूरी तरह सफल हुआ। टीम अवश्य जीतेगी। हमें पूरा विश्वास है। निक्की प्रधान की मां जितनी देवी ने कहा कि निक्की खूंटी की ही बेटी नहीं बल्कि पूरे देश की बेटी है। उन्होंने कहा कि निक्की में हॉकी के प्रति बचपन से ही काफी लगाव था। अभाव के बीच खेल को जारी रखा और आज टोक्यो में खेल रही है। भारतीय टीम गोल्ड मेडल जीतकर ही वापस आएगी।

निक्की प्रधान ओलिंपिक खेलने वाली खूंटी की पहली महिला खिलाड़ी हैं। (फाइल)

निक्की प्रधान ओलिंपिक खेलने वाली खूंटी की पहली महिला खिलाड़ी हैं। (फाइल)

गांव में लड़कियाें के खेलने पर पाबंदी थी, 26 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी यहीं से

60 परिवार और 300 की आबादी वाला हेसेल खूंटी जिले का ऐसा गांव है, जहां से 26 राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और स्टेट लेवल महिला खिलाड़ी निकली हैं। इनमें से 13 खिलाड़ी अपने खेल की बदाैलत सरकारी नौकरी में है। इन्हीं में एक है निक्की प्रधान, जाे ओलिंपिक खेलने वाली खूंटी की पहली महिला खिलाड़ी हैं। राजकीय उत्क्रमित उच्च विद्यालय पेलौल के पूर्व शिक्षक व हाॅकी कोच दशरथ महतो ने बताया कि छाेटे से इस गांव की 73 लड़कियां और 13 लड़के खेल मैदान में अपना जौहर दिखा रहे हैं।

हेसेल में पहले लड़कियाें के खेल पर पाबंदी थी। समाज में इसे अच्छा नहीं माना जाता था। 20-22 साल पहले जब वहां लड़कियाें ने हाॅकी खेलना शुरू किया ताे गांव के लाेग कहते थे कि लड़कियां खेलेंगी ताे बिगड़ जाएंगी। बेटियाें से कौन शादी करेगा। काेच दशरथ महताे काे भी ग्रामीणाें का विराेध झेलना पड़ा। उन्हें खेल बंद करने की धमकी दी गई। एक दिन जब उसी गांव की बेटी पुष्पा प्रधान भारतीय हाॅकी टीम से न्यू जर्सी अमेरिका में भारत का प्रतिनिधित्व कर गांव लौटी तो सबका नजरिया बदल गया।

 

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