मनुष्य स्वयं को पहचानना भूल रहा है जिसके कारण वह समस्याओं से घिरा हुआ

भूल जाना या उसकी वास्तविकता से अनजान रहना हर पल के दुख और पीड़ा का परिणाम है। तनाव का भार वहन करता है। चिंता करना बंद नहीं कर सकता। लाभ-हानि, सुख-दुःख, सुख-दुःख जीवन के अर्थ को अर्थहीन कर देते हैं। असंतुलन और अहंकार में रहते हुए वह जीवन को कहीं बोझ समझने लगता है, जबकि इस बोझ से छुटकारा पाने का उपाय उसके पास ही है। अपने भीतर गोता लगाना जरूरी है। जब भी वह ऐसा प्रयास करता है तो उसे लगता है कि जीवन बहुत कीमती, आनंदमय और आदर्श है। मनुष्य स्वयं को पहचानना भूल रहा है।

 

 इसलिए वह समस्याओं से घिरा हुआ है। ऐसे में उसके लिए यह सोचना जरूरी है- जो मैं हूं, जो नहीं हूं, उसे मैं स्वीकार करता हूं। उसके अभिमान को मत खिलाओ। आखिर खुद को खुद से बेहतर कौन जान सकता है। शुद्ध आचरण, शुद्ध विचार और चरित्र व्याख्या ही धर्म का सच्चा रूप है। सांसारिक समस्याओं का समाधान इन्हीं में छिपा है। हम धर्म की अर्थपूर्ण संरचना चाहते हैं लेकिन उसके लिए गलत साधन चुनते हैं। 

 

दुराचार हम गलत तरीका अपनाते हैं। शैली और मानक भी गलत हैं। फिर अच्छे धर्म का असली रूप कैसे सामने आएगा। भगवान महावीर ने कहा है कि धर्म का सही अर्थ समझो। सही मायने में धर्म का आनंद लें। चाहे धर्म हमें अभी या भविष्य में शांति, समृद्धि और समाधि देता है, इसका कोई मूल्य नहीं है। मूल्य धर्म है, भाईचारा चाहिए, पवित्रता, क्या किया जा सकता है और क्या नहीं किया जा सकता है, इसकी अनुभूति और समझ का यह एक ऐसा सूत्र देता है कि व्यक्ति हर स्थिति में आनंद का अनुभव कर सकता है। वास्तव में महावीर द्वारा दिखाए गए वे सभी सत्य धर्म के व्याख्यात्मक सूत्र बन गए हैं, जिन्हें उन्होंने न केवल अपनाया बल्कि साधना की गहराइयों में उतरकर हासिल भी किया। आज हमें भी उनके विचार के अनुसार जीना चाहिए, धर्म को नहीं अपनाना चाहिए।

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