मलाला की ईरान को दो-टूक ,दीवारें नहीं, उनकी आवाज़ें ऊंची होनी चाहिए क्या दुनिया अब सुनेगी?
News India Live, Digital Desk : दुनिया भर में लड़कियों की शिक्षा और हक की लड़ाई लड़ने वाली मलाला यूसुफ़ज़ई ने एक बार फिर कुछ ऐसा कहा है जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। इस बार उनका इशारा किसी स्कूल की तरफ नहीं, बल्कि उन दीवारों की तरफ है जो ईरान में महिलाओं की आवाजों को दबाने की कोशिश कर रही हैं। मलाला ने साफ़ शब्दों में कहा है कि अब वो वक्त आ गया है जब दुनिया को ईरान की महिलाओं की न केवल बात सुननी चाहिए, बल्कि उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य खुद तय करने का मौका देना चाहिए।
हक और सम्मान की मांग
अक्सर जब हम ईरान की बात करते हैं, तो दिमाग में पाबंदियां और संघर्ष की तस्वीरें घूमने लगती हैं। लेकिन मलाला ने यहाँ एक बहुत गहरी बात की है। उनका कहना है कि औरतें सिर्फ रैलियों का हिस्सा भर नहीं हैं, वे उस देश का हिस्सा हैं, उसकी राजनीति का आधार हैं। उन्हें यह हक होना चाहिए कि उनके देश के कानून उनके बारे में क्या कहते हैं और उनका कल कैसा होगा, इसमें उनकी बराबरी की राय हो।
सिर्फ कागजों पर नहीं, ज़मीनी आज़ादी की ज़रूरत
मलाला का यह बयान उस माहौल में आया है जहाँ पिछले कुछ समय से ईरान की सड़कों पर 'महिला, जीवन और स्वतंत्रता' के नारे गूँज रहे हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफ़ज़ई बखूबी समझती हैं कि जब किसी को दबाया जाता है, तो उसकी आवाज़ और बुलंद होती है। उन्होंने साफ़ किया कि ईरान की शांति और खुशहाली तभी संभव है जब वहाँ की बेटियों और औरतों को 'सेकेंडरी नागरिक' नहीं, बल्कि 'बराबर का फैसला लेने वाला' समझा जाए।
पॉलिटिकल फ्यूचर (राजनीतिक भविष्य) ही क्यों?
सवाल ये उठता है कि मलाला ने राजनीति का ही नाम क्यों लिया? असल में किसी भी समाज का ढांचा उसके कानून और राजनीति से बनता है। अगर वहां फैसले लेने वाले मेजों पर महिलाओं की कुर्सी ही नहीं होगी, तो कानून कभी उनके हक में नहीं होंगे। मलाला ने इसी तरफ इशारा किया है—कि अब यह समय ईरान की महिलाओं के लिए खुद अपना भविष्य लिखने का है।
हम और आप क्या सोचें?
देखा जाए तो यह लड़ाई सिर्फ ईरान की नहीं है। दुनिया के किसी भी कोने में अगर औरतों से उनका 'चॉइस' (चुनाव) करने का हक छीना जाता है, तो वो इंसानियत के खिलाफ है। मलाला की यह अपील शायद उन्हीं जंजीरों को तोड़ने की एक कोशिश है जो सालों से कट्टरता और पाबंदियों के नाम पर खड़ी की गई हैं।
मलाला का ये साहस दिखाता है कि एक आवाज़ कितनी दूर तक जा सकती है। अब देखना यह है कि क्या ये बातें सिर्फ खबर बनकर रह जाती हैं या ईरान की सड़कों पर बदलाव की कोई नई लहर लेकर आती हैं।