जहां कन्द मूल दिखाई पड़े वही छलांग लगा दो

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ व्यक्ति को अभिव्यक्ति की आजादी है लोकतंत्र का अर्थ है, एक ऐसी जीवन पद्धति जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं।’ यह संविधान निर्माता बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था।लोकतंत्र’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय डेमोक्रेसी है जिसकी उत्पत्ति ग्रीक मूल शब्द डेमोस से हुई है। डेमोस का अर्थ होता है- ‘जन साधारण’ और इस शब्द में ‘क्रे्रेसी शब्द जोड़ा गया है जिसका अर्थ शासन होता है।सरटोरी ने अपनी पुस्तक ‘ *डेमोक्रेटिक थ्योरी’* में लिखा है कि राजनीतिक लोकतंत्र एक तरीका या प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रतियोगी संघर्ष से सत्ता प्राप्ति की जाती है और कुछ लोग इस सत्ता को नेतृत्व प्रदान करते हैं। सरटोरी के अनुसार लोकतंत्र काफी कठिन शासन है, इतना कठिन कि केवल विशेषज्ञ लोग ही इसे भीड़तंत्र से बचा सकते हैं अत: इसकी प्रक्रिया को मजबूत बनाना आवश्यक है।आज जिस तरह नेतागण दलबदल कर रहे हैं, उससे भारतीय राजनीति के चरित्र को लेकर कुछ जरूरी सवाल खड़े हो गए हैं।दलबदल हमारी शानदार राजनीतिक परपंरा का हिस्सा है इससे परहेज कैसा । यह तो विचारों के तालमेल का मामला है बस । वैसे कहना तो यह चाह रहे थे कि सीटों या टिकटों के तालमेल का मामला है । लेकिन आप जानते हैं कि इतना शब्दों का घालमेल तो चलता ही है।
शुरुआत करते हैं उस देश की परंपरा से जहां से भारत ने दलवादी संसदीय व्यवस्था उधार में ली।प्रसिद्ध ब्रिटिश राजनेता विंस्टन चर्चिल (1874-1965) ने अपने संसदीय जीवन की शुरुआत कंज़र्वेटिव पार्टी से की थी और सन् 1900 में वे इसी पार्टी के टिकट पर सांसद बने।लेकिन चार साल के भीतर ही उनका अपनी सरकार से मोहभंग हुआ तो वे अपनी पार्टी छोड़कर लेबर पार्टी में शामिल हो गए थे। भारत मे यूपी समेत 5 राज्यो में विधानसभा 2022 के चुनाव होने है लेकिन यूपी में स्वामी प्रासाद मौर्य समेत कई दिग्गज नेता बीजेपी छोड़ सपा में शामिल हो गए। लेकिन अभी आधिकारिक रूप से नही जुड़े है ।सपा में शामिल होने की घोषणा बाद बीजेपी हाईकमान में हड़कम्प मच गया और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को तत्काल स्वामी प्रसाद मौर्या जी को मनाने के लिए लगा दिया गया सफलता की जगह निराशा हाथ लगी स्वामी प्रसाद मौर्या ने सरकार पर पक्षपात का आरोप लगाया उनके फैसले के बाद वन मंत्री दारा सिंह भी बीजेपी से इस्तीफा दिए ।जिसके बाद पार्टी हाईकमान में खलबली मच गई यूपी विधानसभा के चुनाव से पहले अचानक से पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे देना बीजेपी के लिए किसी झटके से कम नहीं था बीजेपी सरकार में मंत्री रहे दोनों लोगों को मनाने के लिए काफी भरसक प्रयास किए गए लेकिन दोनों ने मना कर दिया खबर आई 2014 में बसपा शासनकाल में स्वामी प्रसाद मौर्य ने धार्मिक उन्माद से संबंधित भड़काऊ भाषण दिया था उसके बाद वह बीजेपी में शामिल हुए लेकिन भारतीय जनता पार्टी को और कोर्ट को स्वामी प्रसाद मौर्य के द्वारा दिया गया भाषण याद नहीं आया और मौर्या जी को भी समझ मे नहीं आया की यहाँ दलित, पिछडो की नही सुनी जा रही है समझ मे तब आया जब विधानसभा चुनावो की घोषणा हुई अब तो अपना उल्लू सीधा हो ही गया है जनता तो वैसे ही मूर्ख है चुनाव है मैनेज कर लिया जाएगा। मौर्या जी ने जैसे ही वह समाजवादी पार्टी में शामिल होने की घोषणा की तो कोर्ट को याद आया कोई इनका मामला भी था और कोर्ट ने तुरंत उनका समन्न जारी कर दिया एक बात तो साफ चाहे वह कोई भी नेता या कोई भी पार्टी हो सबको धर्म आस्था और जाति व्यवस्था के नाम पर बेवकूफ बनाकर आसानी से चुनाव जीता जा सकता है अगर विकास के मुद्दों की बात की जाए इस पर चुनाव काम लेकिन धर्म आस्था जैसे मुद्दों को लेकर आजकल के नेता एक पार्टी से दूसरे पार्टी जाने में गुरेज नहीं करते हैं और आरोप लगाते हैं कि जब आपकी पार्टी में रहा तो समाज के लोगों की जन समस्याओं को सुना नहीं गया और पार्टी भी नेताओ के दल बदलने पर कमजोरियों को टटोल कर लगाम लगाने के प्रयास में लग जाती है। अब तो जनता को सोचना चाहिए कि उन्हें क्या करना है वरना ऐसे राजनेताओं की राजनीति में फंसकर अपने वोट का सही न्याय नहीं कर पाएंगे और राजनीति के मकड़जाल में फंसकर उलझते रहेंगे। इसलिए जनता को भी अपना वोट सोच समझ कर सही व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए।

रिपोर्ट-

योगेन्द्र गौतम
उन्नाव

Check Also

सावधान… गलती से भी न लें इस मेडिकल कॉलेज में एडमिशन, नहीं होगी एमबीबीएस की डिग्री

भारत से हर साल बड़ी संख्या में छात्र मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश जाते …