कर्ज लेकर देश को 'गोल्ड' जिताने वाली भारतीय महिला खिलाड़ी की लाचारी, सब्जी बेचने को मजबूर; CM हेमंत सोरेन ने दिए तुरंत मदद के आदेश
झारखंड की धरती ने देश को एक से बढ़कर एक नायाब खेल प्रतिभाएं दी हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिरंगा फहराया है। लेकिन इसी माटी से एक ऐसी कड़वी और झकझोर देने वाली सच्चाई सामने आई है, जिसने पूरे खेल जगत और प्रशासनिक तंत्र को सन्न कर दिया है। देश के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में अपनी मेहनत, लगन और जज्बे के बल पर गोल्ड मेडल जीतने वाली एक महिला खिलाड़ी आज पाई-पाई को तरस रही है। जिस खिलाड़ी ने अपनी गाढ़ी कमाई और भारी-भरकम कर्ज लेकर विदेशी सरजमीं पर भारत का मान बढ़ाया था, आज वही खिलाड़ी अपना और अपने परिवार का पेट पालने तथा साहूकारों का कर्ज चुकाने के लिए सड़कों के किनारे सब्जी बेचने को मजबूर हो गई है। यह मामला न केवल खिलाड़ियों के प्रति हमारी व्यवस्था की उपेक्षा को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सही समय पर प्रोत्साहन न मिलने से देश की प्रतिभाएं किस कदर गुमनामी के अंधेरे में खो जाती हैं।
खेल के प्रति अटूट जुनून और कर्ज के बोझ में दबी नेशनल चैंपियन
इस अंतरराष्ट्रीय विजेता खिलाड़ी का सफर कभी आसान नहीं रहा। एक बेहद गरीब और साधारण परिवार में जन्मी इस एथलीट ने बचपन से ही खेल के मैदान में पसीना बहाया। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका आया, तो वित्तीय संसाधनों की भारी कमी आड़े आ गई। सरकारी मदद और स्पॉन्सरशिप का इंतजार करते-करते जब समय बीतने लगा, तो खिलाड़ी ने अपने खेल के सपने को टूटने नहीं दिया। अपने जुनून को जिंदा रखने और भारत को पदक दिलाने के लिए उसने पड़ोसियों, रिश्तेदारों और स्थानीय साहूकारों से भारी ब्याज दर पर कर्ज लिया। इस रकम से उसने अपनी ट्रेनिंग, खेल किट, खुराक और यात्रा के खर्चों को पूरा किया। मैदान पर उतरी तो उसने अपनी पूरी जान झोंक दी और शानदार प्रदर्शन करते हुए देश को 'गोल्ड मेडल' दिलाया। लेकिन पदक जीतकर घर लौटने के बाद की सच्चाई किसी भयानक सपने जैसी साबित हुई। ढोल-नगाड़ों और शुरुआती सराहना का शोर थमते ही खिलाड़ी अपने उसी पुराने टूटे हुए मकान और भारी कर्ज के कड़वे सच के बीच अकेली खड़ी रह गई।
जब पदक की चमक के पीछे छिप गया पेट की भूख का दर्द
मेडल जीतने के बाद उम्मीद थी कि राज्य सरकार, खेल विभाग या कोई कॉर्पोरेट घराना इस होनहार एथलीट का हाथ थामेगा। उसे लगा था कि उसे कोई स्थायी नौकरी या आर्थिक प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे वह अपना कर्ज चुका सकेगी और आगे की ट्रेनिंग जारी रख सकेगी। लेकिन समय गुजरता गया और आश्वासनों के अलावा कुछ हाथ न आया। कर्जदारों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था और ब्याज की रकम दिन-ब-दिन पहाड़ जैसी होती जा रही थी। दैनिक जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करना और दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना दूभर हो गया। अंततः, कोई अन्य रास्ता न देखकर इस प्रतिभावान खिलाड़ी ने अपने मेडल को एक तरफ रखा और टोकरी में सब्जी भरकर बाजार की पटरियों पर बैठना शुरू कर दिया। सुबह से शाम तक सब्जी बेचकर जो चंद रुपये मिलते हैं, उससे किसी तरह परिवार की गुजर-बसर होती है और कर्ज की किस्त चुकाने की कोशिश की जाती है। खेल के मैदान में भारत का सिर ऊंचा करने वाली यह बेटी आज ग्राहकों की राह देखने पर मजबूर है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कड़ा संज्ञान और खेल विभाग को सख्त निर्देश
जैसे ही यह दुखद और हैरान कर देने वाली खबर मीडिया तथा सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हुई, राज्य प्रशासन में हड़कंप मच गया। मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने तुरंत इस पर कड़ा संज्ञान लिया। मुख्यमंत्री सोरेन ने बिना कोई वक्त गंवाए राज्य के खेल विभाग को तत्काल प्रभाव से इस पूरे मामले की जांच करने और खिलाड़ी तक हर संभव सहायता पहुंचाने के निर्देश जारी किए। उन्होंने अधिकारियों से स्पष्ट रूप से कहा कि राज्य का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों की यह दुर्दशा किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मुख्यमंत्री के इस कड़े रुख के बाद खेल विभाग और स्थानीय प्रशासन की टीम तुरंत हरकत में आई और संबंधित खिलाड़ी के घर पहुंचकर उसकी वित्तीय स्थिति और समस्याओं का जायजा लिया।
खिलाड़ियों के पुनर्वास और सरकारी योजनाओं पर उठते तीखे सवाल
मुख्यमंत्री के सीधे हस्तक्षेप के बाद उम्मीद जगी है कि इस पीड़ित एथलीट को जल्द ही उचित मुआवजा, बकाया कर्ज से मुक्ति और एक सुरक्षित भविष्य के लिए रोजगार का अवसर मिलेगा। हालांकि, यह घटना एक बड़े और नीतिगत सवाल को जन्म देती है। झारखंड में खिलाड़ियों के लिए सीधी नियुक्ति नीति और प्रोत्साहन राशियां कागजों पर तो बहुत आकर्षक दिखती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन समय पर क्यों नहीं हो पाता? यदि किसी खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपनी जमीन गिरवी रखनी पड़े या कर्ज लेना पड़े, तो यह हमारी खेल व्यवस्था की सबसे बड़ी नाकामी है। खेल प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों की मांग है कि सरकार को ऐसा पारदर्शी और त्वरित ढांचा तैयार करना चाहिए जिससे दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब एथलीटों को समय पर सीधी आर्थिक मदद और कोचिंग सुविधाएं मिल सकें, ताकि किसी भी 'गोल्ड मेडलिस्ट' को देश का मान बढ़ाने के बाद सब्जी बेचने की नौबत न आए।