नए MMDR Act के खिलाफ आर-पार के मूड में सीएम हेमंत सोरेन, सुप्रीम कोर्ट का खटखटाहट दरवाजा

नए MMDR Act के खिलाफ आर-पार के मूड में सीएम हेमंत सोरेन, सुप्रीम कोर्ट का खटखटाहट दरवाजा

खनिज संपदा से भरपूर झारखंड राज्य और केंद्र सरकार के बीच एक बार फिर से टकराव के बादल पूरी तरह से मंडराने लगे हैं। देश के खनिज और खनन क्षेत्र को विनियमित करने वाले केंद्रीय खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम यानी एमएमडीआर एक्ट (MMDR Act) में किए गए नए संशोधनों और प्रावधानों को लेकर झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार बेहद आक्रामक रुख अपना चुकी है। राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने साफ तौर पर यह ऐलान कर दिया है कि केंद्र सरकार के ये नए खनिज कानून झारखंड के वित्तीय हितों, स्वायत्तता और खनिज संपदा पर सीधा प्रहार करते हैं, जिससे राज्य के खजाने को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इस स्थिति से निपटने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की सरकार अब पीछे हटने के मूड में नहीं है और उसने इस एक्ट के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का ऐतिहासिक फैसला कर लिया है। इस कानूनी और राजनीतिक जंग के छिड़ने से केंद्र और राज्य के रिश्तों में एक बार फिर भारी तनाव पैदा हो गया है, जिसकी गूंज पूरे देश के राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रही है।

क्या है नया MMDR Act और क्यों इसे लेकर झारखंड सरकार में मचा है भारी बवाल

खान और खनिज विकास और विनियमन अधिनियम (MMDR Act) में केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में जो संशोधन लाए गए हैं, उनका मुख्य उद्देश्य देश भर में खनन नीलामी प्रक्रिया में एकरूपता लाना और रणनीतिक खनिजों के दोहन को तेज करना है। हालांकि, झारखंड जैसे आदिवासी बहुल और देश के सबसे बड़े खनिज उत्पादक राज्य के लिए ये नए प्रावधान किसी बड़े आघात से कम नहीं हैं। राज्य सरकार का यह कड़ा तर्क है कि झारखंड की धरती के नीचे मौजूद कोयला, आयरन ओर, बॉक्साइट और अन्य बेशकीमती खनिजों पर पहला अधिकार यहां की स्थानीय जनता और राज्य सरकार का है। नए एक्ट के लागू होने से न केवल राज्य के रॉयल्टी कलेक्शन और राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, बल्कि खदानों के आवंटन और नीतिगत फैसलों में स्थानीय प्रशासनिक अधिकार भी कमजोर होंगे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का यह कहना है कि केंद्र सरकार राज्यों से बिना किसी सार्थक विचार-विमर्श के ऐसे कानून थोप रही है जो संघवाद (Federalism) की मूल भावना के पूरी तरह खिलाफ हैं और राज्य के अधिकारों का हनन करते हैं।

झारखंड के खजाने और आर्थिक स्वायत्तता पर मंडराता गंभीर खतरा

झारखंड राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा हिस्सा खनन क्षेत्र (Mining Sector) और उससे मिलने वाले राजस्व पर निर्भर करता है। राज्य के खजाने में आने वाले पैसों का एक बड़ा हिस्सा कोयला और अन्य खनिजों की रॉयल्टी से आता है, जिससे राज्य के विकास कार्यों, सामाजिक कल्याण योजनाओं और बुनियादी ढांचे के निर्माण को गति मिलती है। नए एमएमडीआर एक्ट के तहत जिस तरह से नियंत्रण केंद्रीय एजेंसियों के हाथों में केंद्रित किया जा रहा है, उससे राज्य सरकार को अंदेशा है कि आने वाले समय में झारखंड को उसकी अपनी ही धरती की संपदा से मिलने वाले मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ सकता है। अर्थशास्त्रियों और प्रशासनिक जानकारों का भी यह मानना है कि यदि इस कानून को बिना किसी संशोधन के लागू रहने दिया गया, तो देश के खनिज राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता बुरी तरह प्रभावित होगी। यही कारण है कि सीएम हेमंत सोरेन ने इसे झारखंड की अस्मिता और आर्थिक सुरक्षा से जोड़ते हुए इस पर कड़ी आपत्ति जताई है और कानूनी लड़ाई लड़ने का साहसिक निर्णय लिया है।

सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई की तैयारी और राजनीतिक रणनीतिक उठापटक

झारखंड सरकार के महाधिवक्ता और वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की टीम ने नए एमएमडीआर एक्ट के विभिन्न प्रावधानों का बारीकी से अध्ययन करना शुरू कर दिया है। सरकार का यह कानूनी दल इस बात की रूपरेखा तैयार कर रहा है कि संविधान के किन अनुच्छेदों और शक्तियों के बंटवारे के तहत केंद्र के इन संशोधनों को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी जाए। राजनीतिक मोर्चे पर भी इस फैसले के दूरगामी परिणाम देखने को मिल रहे हैं। विपक्षी दलों और क्षेत्रीय ताकतों का मानना है कि केंद्र सरकार लगातार गैर-भाजपा शासित राज्यों के अधिकारों में दखलंदाजी कर रही है। झारखंड सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने के इस कदम से देश के अन्य खनिज समृद्ध राज्यों जैसे छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी हलचल तेज हो गई है। यदि सुप्रीम कोर्ट में यह मामला मजबूती से आगे बढ़ता है, तो यह देश के संघीय ढांचे और खनिज अधिकारों के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।

खनिज संपदा और राज्य के अधिकारों की रक्षा का यह है निर्णायक दौर

झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों सिर्फ और सिर्फ इसी बात की चर्चा है कि क्या केंद्र और राज्य के बीच का यह संघर्ष अदालत के जरिए किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचेगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पहले भी कई बार केंद्र के रवैये के खिलाफ खुलकर अपनी आवाज बुलंद की है और इस बार खनिज एक्ट को लेकर उन्होंने आर-पार की लड़ाई का जो शंखनाद किया है, उसने स्पष्ट कर दिया है कि झारखंड अपनी संपदा की लूट किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगा। आने वाले दिनों में यह कानूनी लड़ाई न केवल झारखंड के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि देश में खनिज संसाधनों पर राज्यों का वास्तविक अधिकार कितना सुरक्षित रह पाता है। राज्य की जनता और यहां के किसान-आदिवासी इस पूरी कानूनी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि यह सीधे तौर पर उनके भविष्य और राज्य की समृद्धि से जुड़ा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील मामला है।