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उल्हासनगर में ३ लाख सिंधी समुदाय की आबादी पर ३ स्कुल सिंधी भाषा के नहीं !

उल्हासनगर :  सिंधी भाषा आज भी भारत के पश्चिमी हिस्से और मुख्य रूप से सिंध प्रान्त में बोली जाने वाली एक प्रमुख भाषा है. यह सिंधी हिंदू समुदाय की मातृ-भाषा है, सन् 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ और सिंध के हिन्दू सिंधी भारत में आए और देश के विभिन्न राज्यों में बस गए. गुजरात के कच्छ जिले मे सिंधी भाषा को कच्छी भाषा कहते हैं और कच्छ में भी यह भाषा बोलते हैं.

सिन्धी एक मात्र ऐसी भाषा है, जिसकी दो लिपियों को भारतीय संविधान की मान्यता है. भारत सरकार ने 10 अप्रैल 1967 में सिंधी भाषा को संविधान में मान्यता प्रदान की, साथ-साथ सिंधी भाषा के लिए दोनों लिपियों अरबी-फारसी तथा देवनागरी लिपि को मंजूर किया था. आज़ादी के बाद सिंधी समाज के वरिष्ठों ने सिंधी भाषा को जीवित रखने के लिये लम्बी लड़ाई लड़ी थी, जिसमे उल्हासनगर के भी सिंधी नेताओं ने अगुवाई की थी. आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि वर्ष 1947 में उल्हासनगर में मात्र सिंधी समुदाय की 30 हजार आबादी के लिये 30 सिंधी स्कुल खुले थे, परंतु आज ये हाल है कि, सिंधी समुदाय की आबादी 3 लाख होकर भी 3 सिंधी स्कुल इस सिंधी बहुल शहर में नहीं है और जो स्कुल है वो भी अगले साल बन्द हो जायेंगे। अत्यंत शर्मनाक बात है, बड़ों को तो सिंधी आ गयी परंतु आगामी 10 साल में आनेवाली पीढ़ी में सिंधी बोली भाषा लुप्त हो जाएगी।

उल्हासनगर मनपा शिक्षण मंडल की मानें तो मनपा द्वारा पहले संचालित 9 से अधिक सिंधी स्कूलों में शहर पुर्व में शांतिप्रकाश स्कुल में सिंधी सिखाई जाती है और पश्चिम में सिंधी भाषा के लिये प्रसिद्ध माने जाने वाले झुलेलाल स्कुल में सिंधी की ७ वी कक्षा अगले साल बन्द की जायेगी। बहरहाल ३ लाख की आबादी में मात्र 300 ही बच्चे सिंधी भाषा सीखने में इच्छा रखते दिखाई दिए, इसी कारण स्कूलों में सिखाई जाने वाली सिंधी भाषा धीरे धीरे इस सिंधी बहुल शहर में सिंधियों के बीच से ही सिंधियों की ही वजह से लुप्त हो जाएगी।

यानि सिंधी भाषा, बोली, सभ्यता और संस्कृति को बचाने, अपने बच्चों को सिंधी सिखाने, भाषा जीवित रखने के लिये कोई रहनुमा नहीं है. हालांकि सिंधी समाज के उत्थान के लिए कई सिंधी संस्थाएं है लेकिन किसी भी संस्था द्वारा सिंधी भाषा के स्कूल के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है. केवल कार्यक्रम कर सिंधी भाषा, बोली, सभ्यता और संस्कृति को बचाने की बड़ी-बड़ी बातें की जाती है परन्तु सही मायने में बच्चों को सिंधी भाषा का ज्ञान दिलाने के प्रति कोई दिलचस्पी नजर नहीं आ रही है.

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