सम्राट अशोक के सम्मान की लड़ाई में जाति की एंट्री:कभी CM ने निकाली थी जन्मतिथि, अब मांझी ने जाति भी खोज ली, इतिहासकार बोले- सारी बातें बेसिर-पैर की

पटना2 घंटे पहले

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सम्राट अशोक की तुलना मुगल शासक औरंगजेब से करने का विवादित बयान अब बिहार में जातियों के सम्मान का बखेड़ा बन गया है। हर मामले में जाति की चर्चा छेड़ने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने तो इसे दलितों और पिछड़ों का अपमान तक बता दिया है। मांझी से पहले भी बिहार के कई नेता सम्राट अशोक की जाति तय कर चुके हैं। ऐसे में इतिहासकार, इतिहास के साथ होते इस छेड़छाड़ पर अपनी विवशता जाहिर करने को मजबूर हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या नेता सच में सम्राट अशोक के सम्मान की लडाई लड़ रहे हैं या माजरा कुछ और ही है।

बता दें, पिछले दिनों भाजपा कल्चरल सेल के नेशनल कन्वेनर और प्रसिद्ध लेखक दया प्रकाश सिन्हा ने सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब से कर दी थी। इस पर सत्तारुढ़ दल की दो पार्टी आपस में भीड़ गई हैं। दरअसल, JDU ने सिन्हा की इस टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज जताया है। यहां तक कि उनको मिले पद्मश्री पुरस्कार को वापस करने की मांग की है।

सम्राट अशोक के काल में जाति नहीं वर्ण आधारित था समाज

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 4 अप्रैल 2017 को श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित समारोह में एक ऐलान किया था। उन्होंने कहा था, ‘चैत्र माह के अष्टमी को ही ‘अशोक अष्टमी’ कहा जाता है, इसलिए यही सम्राट अशोक की जयंती का दिन है। इसके बाद बिहार में हर 14 अप्रैल को सम्राट अशोक की जयंती पर राजकीय अवकाश घोषित कर दिया गया।’ तब इतिहासकार नीतीश कुमार की खोज पर भौचक्के रह गए थे कि उन्होंने सम्राट अशोक की जन्मतिथि कैसे निकाल ली, लेकिन अब तो बिहार में सम्राट अशोक की जाति भी पता लगा ली गई है।

हद तो यह है कि इस झूठ को भी बार-बार ऐसे कहा जा रहा है मानो इसका कोई पुख्ता प्रमाण बिहार के नेताओं के हाथ लग गया है। पटना विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में वरिष्ठ प्राध्यापक रहे प्रो. अवध किशोर प्रसाद ने सम्राट अशोक की जाति को लेकर स्पष्ट कहा है, ‘ये पूरी बातें बेसिर-पैर की है।’ उनके मुताबिक, मौर्य काल में जातियां थी नहीं। जातियां ईसा की प्रारंभिक सदी में बननी शुरू हुई थीं। वो कहते हैं मनु स्मृति में भी 61 जातियों की बातें सामने आई थीं और मनु स्मृति भी ईसा के प्रारंभिक सदी में लिखी गई थी।’

जीतन राम मांझी का ट्वीट।

जीतन राम मांझी का ट्वीट।

सम्मान की नहीं, जातीय गोलबंदी है असल मकसद

सम्राट अशोक को लेकर बिहार के राजनेताओं का जो प्रेम जागा है उसकी असल वजह वो जातियां हैं जिन्होंने बातों-बातों में भी अपने-आप को उनका वंशज घोषित कर दिया है। बिहार में कुशवाहा समाज अपने-आप को सम्राट अशोक का वंशज बताता है।

राष्ट्रवादी कुशवाहा परिषद तो हर साल पटना में अशोक का जन्मदिन भी मनाती है। वोट के लिहाज से समझने की कोशिश करें तो बिहार में कोइरी यानी कुशवाहा जाति की आबादी पिछड़े वर्ग में यादव के बाद दूसरे स्थान पर है, लेकिन ये वोट यादवों की तरह एकजुट नहीं रहा है। ये बंटता रहा है। यही वजह है कि बिहार की सभी पार्टियां इसके एकमुश्त वोट बटोरने के लिए इनके तुष्टीकरण तक से परहेज नहीं करती। इसका नतीजा है कि बिना जन्मतिथि जाने CM नीतीश कुमार सम्राट अशोक की जयंती का ऐलान कर देते हैं तो BJP विवादित बोलने वाले लेखक दया प्रसाद सिन्हा पर FIR तक कर देती है।

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