दिल का दर्द

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काली घटायें अश्कों की बूँदे बन कर
दिल का दर्द बयां कर जाती हैं अक्सर
अस्तित्व को तलाशती औरत की ज़िंदगी __
कलम कहाँ लिख पाती है उतना दर्द
जो जमा होता है अक्सर भीतर
रिसते घाव भरते कहाँ है
बेमतलब की बातें
तस्वीरों में रंग भरती कहाँ है __
किसी को बदलना आसां कहाँ
सच कहना भी गुनाह हो गया
हमें अपनी ख़ामोशी से प्यार हो गया _
तकलीफ़ है या सकुन पता नहीं
बहुत सी बातें समझ ही न पाये
दिल की बातें कह भी न पाये
सोचा फिर से जिएँगे ज़िंदगी को
वो पल जो जिए ही नहीं __
छूटी डोर को कस के पकड़े रखेंगे
सिसकियों और आँसुओ में गुजरती रही ज़िंदगी
बाँटते रहे ख़ुशियाँ औरों के लिए
संस्कार और मर्यादा की पोटली बांधे
निभाते रहे फ़र्ज़ अपना
ख़ुद के अस्तित्व को तलाशती रही ज़िंदगी __
ख़ुशी ढूँढी जहाँ भी इधर उधर
इक सफ़र था गम का जिधर गयी नज़र
द्वन्द सा चलता मस्तिष्क में हर पल __
शब्द भी काम न आए रिश्तों की तुरपाई में
कौन जी सका ज़िंदगी अपने मुताबिक़
घिर गये थे साज़िशों की खाई में
रास न आए दुनियावी रिश्ते __
हादसों की नदी पर बनाया गया
बांध बन कर रह गयी ज़िंदगी
ख़ुद के अस्तित्व को सोचने की फ़ुरसत किसे थी
साथ कहां देती है अपने साये की परछाई भी
सिसकती रही तन्हाई ज़ाहिर क्यूँ करूँ
अपने दर्द की गहराई __
सब कुछ मुकम्मल है
बस एक अस्तित्व खो गया हैं कहीं
रिश्तों के शहर में
ज्यूँ ही लब खुले मच जाएगा बवंडर
दुनियाँ है तमाशाई__
ख़ुद को किया नियति के हवाले
कभी तो बरसेगी रिमझिम पुरवाई
मेरे आँगन भी चाँदनी करेगी रोशनाई__!!
कमलेश अरोरा

दिल्ली

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