Vodafone Idea में सरकार बनेगी सबसे बड़ी हिस्सेदार, क्या है इसका कंपनी और ग्राहकों के लिये मतलब?

एक तरफ जहां सरकार सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेच रही है, कई कंपनियों को तो पूरी तरह से बेच दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ अब वोडा आइडिया (Vodafone Idea) के मामले में उल्टी गंगा बहती दिख रही है. देश की तीसरी बड़ी टेलीकॉम कंपनी वोडा आइडिया में सरकार सबसे बड़ी हिस्सेदार यानी शेयरधारक बनने जा रही है. दरअसल, सरकार ने टेलिकॉम कंपनियों (Telecom companies) को स्पेक्ट्रम, AGR बकाया (AGR Dues) राशि पर ब्याज के भुगतान के बदले कंपनी की कुछ हिस्सेदारी सरकार के नाम करने का विकल्प दिया था. एयरटेल ने तो सरकार के इस विकल्प को नहीं माना, लेकिन वोडा आइडिया के बोर्ड ने सरकार के इस ऑफर पर अपनी सहमति जता दी है.

वोडा आइडिया में सरकार बनेगी सबसे बड़ी शेयरधारक

वोडा आइडिया के बोर्ड ने टेलीकॉम विभाग को इसके बारे में बता दिया है. कंपनी के मुताबिक स्पेक्ट्रम और AGR बकाया पर मिलाकर उसके ऊपर करीब 16,000 करोड़ रुपए की ब्याज देनदारी है. इसके बदले में बोर्ड ने सरकार को 10 रुपए के भाव पर नए शेयर जारी कर हिस्सेदारी देने का फैसला किया है. ऐसा होने पर वोडा आइडिया में सरकार की 35.8 फीसदी हिस्सेदारी हो जाएगी. फिर कंपनी में वोडाफोन ग्रुप की हिस्सेदारी घटकर 28.5 प्रतिशत बचेगी और आदित्य बिरला ग्रुप की हिस्सेदारी सिर्फ 17.8 फीसदी रह जाएगी यानि वोडा आइडिया में सरकार सबसे बड़ी शेयरधारक हो जाएगी.

कंपनी के फैसले से निवेशक निराश

बोर्ड के इस फैसले के बाद शेयर में 11 जनवरी को 20 फीसदी की भारी गिरावट देखने को मिली. दरअसल बोर्ड के इस फैसले से वोडा आइडिया के निवेशकों को काफी निराशा हुई है. कंपनी में सरकारी हिस्‍सेदारी को लेकर आशंकाएं पैदा हुई हैं. और इस फैसले के बाद कंपनी के कारोबार को लेकर पांच ऐसे बड़े सवाल हैं जो निवेशकों के मन में तैरने लगे हैं. इनका कोई साफ जवाब नहीं मिल रहा. पहला सवाल, वोडा आइडिया और टेलिकॉम विभाग में अगर टकराव हुआ तो सरकार का क्या रुख होगा. दूसरा बड़ा सवाल है कि सरकार टेलिकॉम सेक्टर को कैसे रेग्युलेट करेगी. क्योंकि खुद सरकार सेक्टर का बड़ा प्लेयर होने जा रही है. तीसरा सवाल है कि वोडा आइडिया में अब पैसा कौन लगाएगा. चौथा सवाल है कि क्या सरकार कंपनियों के विनिवेश से हटकर राष्ट्रीयकरण की तरफ बढ़ रही है और पांचवा तथा अहम सवाल है कि जैसे घाटे में चल रही एयरइंडिया से पीछा छुड़वाने के लिए सरकार को इसे बेचने पड़ा. कहीं वैसा ही हाल वोडा आइडिया का तो नहीं होने जा रहा.

क्या होगा ग्राहकों पर असर

सिर्फ निवेशक ही नहीं बल्कि यह घटनाक्रम टेलिकॉम कंपनियों के उपभोक्ताओं पर भी आगे चलकर भारी पड़ सकता है, वोडा आइडिया में अगर सरकार सबसे बड़ी हिस्सेदार बनती है तो टेलिकॉम सेक्टर में सिर्फ 2 बड़े प्राइवेट प्लेयर बच जाएंगे और प्रतिस्पर्धा घटेगी यानि ग्राहकों को लुभाने के लिए कंपनियों की तरफ से सस्ते प्लान की उम्मीद खत्म हो जाएगी और कंपनियों को सेवाओं के बदले ग्राहकों से मनमाने शुल्क वसूलने की छूट हो जाएगी. साल 2016 से टेलिकॉम सेक्टर में जियो की एंट्री पूरा सेक्टर हिल गया है. ग्राहकों की संख्या लिहाज से इस सेक्टर पर एयरटेल तथा वोडा आइडिया का बोलबाला था, लेकिन जियो की एंट्री के बाद इन दोनों कंपनियों के ग्राहक तेजी से घटे हैं, लगभग 3 साल में वोडा आइडिया के ग्राहक 37 फीसद से ज्यादा घट गए हैं.

वोडा आइडिया की दिक्कतें बढ़ेंगी या घटेंगी?

अब सवाल ये है कि वोडा आइडिया बोर्ड के फैसले से कंपनी की दिक्कतें बढ़ेंगी या घटेंगी? स्वास्तिका इनवेस्‍ट मार्ट के हेड ऑफ रिसर्च संतोष मीणा के मुताबिक, ” सरकार के वोडा आइडिया के शेयरधारक बनने से एयरटेल, जियो को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. अच्‍छी बात यह दिख रही है कि सरकार अब इस सेक्टर के सुधार से जुड़े फैसलों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर सकती है.” बात अब वोडा-आइडिया तक ही सीमित नहीं रही है, टेलिकॉम सेक्टर की कुछ और कंपनियां भी कर्ज के बदले सरकार को अपनी हिस्सेदारी देने के लिए राजी हो गई हैं. टाटा टेलिसर्विसेज के बोर्ड ने भी सरकार को हिस्सा देने पर सहमति जता दी है. कंपनी की तरफ से कहा गया है कि कर्ज के बदले कंपनी सरकार को 9.5 फीसदी हिस्सेदारी देगी, देखना होगा कि आगे कौन-कौन कंपनी इस राह पर चलती हैं.

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