फांसी नहीं, इंजेक्शन दो! मौत की सज़ा पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा तीखा सवाल
'फांसी'... यह शब्द सुनते ही मन में एक खौफनाक तस्वीर बन जाती है। सदियों से हमारे देश में गंभीर अपराधियों को सज़ा-ए-मौत देने के लिए फांसी के फंदे का ही इस्तेमाल होता आया है। लेकिन अब देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है:
क्या मौत की सज़ा देने का यह तरीका इतना क्रूर और दर्दनाक होना ज़रूरी है? क्या फांसी के अलावा कोई और 'इंसानी' तरीका नहीं हो सकता?
यह सवाल एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान उठा, जिसमें मांग की गई है कि मौत की सज़ा देने के लिए फांसी के अलावा कम दर्दनाक तरीके अपनाए जाने चाहिए।
क्या है पूरा मामला और क्या कहता है याचिकाकर्ता?
याचिका में कहा गया है कि जब संविधान "सम्मान से जीने का अधिकार" देता है, तो "सम्मान से मरने का अधिकार" भी उतना ही ज़रूरी है। फांसी एक बेहद अमानवीय और तड़पाने वाली प्रक्रिया है।
- क्या हैं विकल्प? याचिकाकर्ता ने अमेरिका जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ अब मौत की सज़ा के लिए घातक इंजेक्शन (Lethal Injection) का इस्तेमाल होता है, जो कम दर्दनाक माना जाता है। इसके अलावा फायरिंग स्क्वाड या बिजली के करंट जैसे तरीके भी हैं, जिनमें दोषी की मौत सिर्फ 5 मिनट में हो जाती है, जबकि फांसी में लंबा वक़्त लग सकता है।
- एक अनोखी मांग: याचिका में यह भी मांग की गई है कि दोषी को यह विकल्प दिया जाना चाहिए कि वह किस तरीके से मरना चाहता है!
सरकार का पुराना राग, सुप्रीम कोर्ट हुआ नाराज़
इस मामले में केंद्र सरकार का रवैया थोड़ा ढीला रहा। सरकार ने अपने पुराने जवाब को दोहराते हुए कहा कि यह एक "नीतिगत मामला" है और फांसी के अलावा कोई और तरीका अपनाना प्रैक्टिकल नहीं है।
सरकार के इस रुख पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई। जजों ने कहा:
"समस्या यह है कि सरकार खुद इस पुराने तरीके को बदलने को तैयार नहीं है। समय बदल चुका है... लेकिन ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार वक़्त के साथ अपने विचारों को बदलने को तैयार नहीं है।"
जब सरकार ने फिर से "नीति" की दुहाई दी, तो कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है।
अब सबकी निगाहें 11 नवंबर पर टिकी हैं, जब इस मामले की अगली सुनवाई होगी। उस दिन सरकार को यह बताना होगा कि जब दुनिया मौत की सज़ा देने के तरीकों में भी इंसानियत ढूंढ रही है, तो भारत सदियों पुरानी इस दर्दनाक प्रक्रिया से आगे क्यों नहीं बढ़ सकता?