गजल

 

 

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*चंद साँसों की अब चाहत नही रही*

चंद सांसो की अब चाहत नही रही
ठहरे जो तेरे वास्ते मुहलत नही रही

कैसा ये इश्क़ है तेरा जो छोड़कर गया
दिल को तेरी आरजू उल्फ़त नही रही

कैसे तेरा यक़ी हो बता दे साथिया
लगता है जैसे दरमयां मुहब्बत नही रही

जाना उन्हें था दूर तो आये थे पास क्यूँ
अब ढूंढने की उनको मशक्कत नही रही

अच्छा किये जो जिंदगी से दूर हो गए
जीने की राह में कोई किल्लत नही रही

क्षमा श्रीवास्तवा
देवरिया उत्तर प्रदेश

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