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पूर्व सीईसी ने चुनाव आयोग पर उठाए सवाल

नई दिल्ली :  चुनाव आयोग और इसके एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) में ठन गई है। दिल्ली चुनाव के दौरान हेट स्पीच देने वाले नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं कराने को लेकर पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी की ओर से उठाए गए सवाल का चुनाव आयोग ने जवाब दिया है और कहा कि वह पसंद के मुताबिक कुछ चीजें याद कर रहे हैं और कुछ चीजें भूल रहे हैं। चुनाव आयोग ने कुरैशी को आईना दिखाते हुए कहा है कि सीईसी के रूप में उनके सामने आचार संहिता उल्लंघन के जितने मामले आए, उनमें से एक में भी एफआईआर नहीं हुई।
अनुराग-प्रवेश पर कार्रवाई करनी चाहिए थी

2010 से 2012 तक चुनाव आयोग का नेतृत्व करने वाले कुरैशी ने 8 फरवरी को प्रकाशित एक लेख में हैरानी जताई थी कि दिल्ली चुनाव के दौरान विवादित बयान देने वाले बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर और बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व कानून या आईपीसी के तहत एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई, जबकि वे ऐसी गलती के लिए दोषी पाए गए थे जिसमें सजा की जरूरत थी। हालांकि, उन्होंने बीजेपी के स्टार कैंपेनर लिस्ट से दोनों को बाहर करने और चुनाव प्रचार पर अस्थायी रोक के लिए चुनाव आयोग की तारीफ की थी। 13 फरवरी को कुरैशी को भेजे जवाब में उप चुनाव आयुक्त संदीप सक्सेना ने उन सभी चुनाव आचार संहिता उल्लंघन मामलों का जिक्र किया जो कुरैशी के कार्यकाल में सामने आए थे। इसमें 9 नोटिस का हवाला दिया गया, जिन्हें उस दौरान जारी किया गया था। उन्होंने लिखा कि इस सूची से देखा जा सकता है कि तब आयोग की तरफ से जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 और 125 या आईपीसी के तहत कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।

कुरैशी के कार्यकाल की रखी गई रिपेार्ट
चुनाव आयोग ने 30 जुलाई 2010 और 10 जून 2012 के बीच हुए चुनावों के 9 कारण बताओ नोटिस का हवाला दिया है, जो कुरैशी के कार्यकाल के दौरान के हैं, जबकि पांच 2012 में यूपी चुनाव के दौरान जारी किए गए थे, तीन 2011 पश्चिम बंगाल चुनाव, दो 2011 तमिलनाडु चुनाव और एक 2010 के बिहार चुनाव के दौरान जारी किए गए थे। इन मामलों में पांच में अडवाइजरी जारी की गई थी, दो मामलों में चेतावनी दी गई थी और बचे हुए दो मामले बंद कर दिए गए थे। किसी भी केस में एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया गया था। इस कालखंड में असम, केरल, पुडुचेरी, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड में हुए चुनावों में आचार संहिता उल्लंघन का कोई नोटिस जारी नहीं हुआ था।

तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने यूपी चुनाव के दौरान अल्पसंख्यकों के लिए 27 फीसदी ओबीसी कोटा में 9 फीसदी रिजर्वेशन का वादा किया था। इस मामले में जारी नोटिस का हवाला देते हुए चुनाव आयोग ने याद दिलाया कि इसके बाद उन्हें सेंसर कर दिया गया था, लेकिन खुर्शीद ने घोषणा को दोहराया तो चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति को लेटर लिखकर हस्तक्षेप की मांग की थी। आखिरकार खुर्शीद ने अपने बयान पर खेद जताया, जिसके बाद चुनाव आयोग ने आगे कोई कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया।

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