समस्याओं से लड़ना हमारी प्राथमिकता

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कहा गया है , ‘ससरति इति संसार:’! अर्थात् संसार परिवर्तनशील है। यहां न सुख शाशवत है , न दुख। तथापि ऐसा प्रतीत होता है कि जीवन दुखों की श्रृंखला से परिपूर्ण एक ऐसा नाटक है, जिसमें सुख कभी- कभी घटित होने वाले क्षण है। अधिकांश लोगो का जीवन दुखो , कष्टों,चिंताओं से जूझते हुए एक के बाद एक निरंतर आने वाली समस्याओं को सुलझाते ही बीत जाता है। कभी शांति,निशिचंतता और आनंद की अनुभूति हो ही नहीं पाती । समस्याओं से जूझने का प्रयास और परिस्थितियों को बदलने का प्रयास उस बाहरी जगत को बदलने का प्रयास है, जिस पर मनुष्य का नियंत्रण नहीं है । मनुष्य तो स्वयं को बदलकर इन परिस्थितियों में शांति ,सुख – चैन यहां तक कि आनंद का भी अनुभव कर सकता है।
यह संसार परमात्मा द्वारा सृजित है । उससे ही प्रतिक्षण इसका सृजन,पोषण और सहार‌ होता है। दिन-रात , सूर्यास्त ,गर्मी-सरदी,जन्म – मृत्यु ,अनंत वनस्पतियां ,जलचर ,थलचर,नभचर,जीव जंतु, उनके क्रियाकलाप उसी परमात्मा की लीला है और इसी का अंश है मनुष्य का जीवन। ऐसे में हमें इन व्यक्तियों ,वस्तुओं , घटनाओं,परिस्थितियों ,भावो अथवा विचारो को अपने अनुकूल पाते है ,उन्हें अच्छा ,और जिन्हें अपने प्रतिकूल पाते है उन्हें बुरा समझते है। स्वयं में ना तो इस संसार में ना तो कुछ अच्छा है और ना कुछ बुरा है। जो कुछ है या हो रहा है, वह मात्र उस शक्ति की इच्छा से हो रहा है। वह बुरा हो ही कैसे सकता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य को क्या करना चाहिए, जिससे वह इन्हीं परिस्थितियों में शांति पूर्वक जीवन व्यतीत कर सके ? संसार में मनुष्य ऐसा प्राणी है, जिसे विकसित वह विवेकशील बुद्धि प्राप्त है। उसे वह शक्ति प्राप्त है ,जिससे वह किसी भी घटना का विश्लेषण कर के देख सकता है। यही सकारत्मक दृष्टिकोण कहलाता है।
मनुष्य अपने विचारो में परिवर्तन करके अपने भीतर और बाहर शांति का अनुभव कर सकता है। विकट प्राकतिक आपदाओं अथवा घरेलू विपत्तियों के समय भी परमात्मा के द्वारा किए जा रहे इन कार्यों को सकरत्मक दृष्टि से देखना परमात्मा पर अटूट विश्वास है और यही है “ममेक शरणं ब्रज” का तात्पर्य । यही एकमात्र वह मार्ग है , जिससे मनुष्य जीवन के सभी संतपो से छुटकारा पा सकता है।

पलक त्रिवेदी
छात्रा
पत्रकारिता विभाग
उन्नाव

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