चंद्रमा पर कदम रखने के बरसों बाद भी यहां ‘ठिकाना’ नहीं बना पाया इंसान, कौन सी चीजें बनी रुकावट, अगर बने बस्ती तो क्या होंगे फायदे?

दुनिया में स्पेस रेस की शुरुआत हो चुकी है. दुनियाभर की स्पेस एजेंसियों के साथ प्राइवेट कंपनियां भी अब अंतरिक्ष की ओर रुख कर रही हैं. पृथ्वी से बाहर इंसानों का ठिकाना अभी तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) ही है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर स्पेस रेस (Space Race) शुरू हो चुकी है तो अभी तक ISS के अलावा, किसी और जगह क्यों इंसानों ने अपना ठिकाना नहीं बनाया है. पृथ्वी के बाहर चंद्रमा एकमात्र ऐसी जगह है, जहां पर इंसानों ने कदम रखा है. वहीं, लोगों का मानना है कि अगर चंद्रमा पर इंसान जा चुका है, तो वह यहां पर स्पेस स्टेशन बनाकर अपनी मौजूदगी क्यों नहीं स्थापित करता है. इससे भविष्य के मिशनों के लिए उसे फायदा मिलेगा.

हमेशा से ही इस बात की चर्चा होती रहती है कि अगर इंसानों को मंगल ग्रह (Mars) तक पहुंचना है, तो इसके लिए हमारा प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा एक बड़ा माध्यम बनेगा. चंद्रमा पर स्पेस स्टेशन का होना और इंसानों की मौजूदगी एस्ट्रोनोट्स के लिए काफी मददगार साबित होगी. चंद्रमा पर मौजूद स्पेस स्टेशन (Space Station on Moon) भविष्य के स्पेस मिशनों के लिए सहायक होगा, क्योंकि ये पृथ्वी को छोड़ने के बाद और सौरमंडल में कहीं भी जाने से पहले एक रुकने वाले ‘स्टेशन’ के तौर पर काम करेगा. ऐसे में अगर हम ये बात जानते हैं तो अभी तक हमने चंद्रमा पर स्पेस स्टेशन क्यों नहीं बनाया और अगर हम ऐसा करते हैं तो इसमें क्या चुनौतियां हैं.

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चंद्रमा पर बेस (सांकेतिक तस्वीर)

चंद्रमा पर इंसानों की मौजूदगी के क्या फायदे हैं?

इंसानों द्वारा अगर चंद्रमा पर स्पेस स्टेशन बनाया जाता है, तो ये अन्य मिशनों के लिए सहायक होगा. चंद्रमा पर स्पेस स्टेशन मौजूद होने से वहां पर टूरिज्म का रास्ता खुल जाएगा. इसके अलावा, चांद पर खुदाई की जा सकेगी और कीमती धातुओं को इस्तेमाल में लाया जा सकेगा. वहीं, ये भविष्य के मिशनों के लिए एक ‘पेट्रोल पंप स्टेशन’ के तौर पर भी काम करेगा. प्राइवेट सेक्टर यहां पर होटल बनाकर स्पेस टूरिज्म को बढ़ा सकेगा. चंद्रमा भले ही हमारे बेहद करीब है, लेकिन इसके कई राज अभी खुलने बाकी है. चांद पर रिसर्च बेस होने से वैज्ञानिक चंद्रमा की लावा ट्यूब गुफाएं, भूगर्भीय गतिविधि के संकेतों की तलाश और ध्रुवों के अंधेरे क्रेटरों में पाए जाने वाले पानी की जांच कर सकेंगे.

दूसरी ओर, चांद पर स्पेस स्टेशन होने से हम इस बात का भी पता लगा पाएंगे कि चांद के गुरुत्वाकर्षण में रहने से इंसानों के स्वास्थ्य और इम्युनिटी पर क्या प्रभाव होगा? इंसानों के अकेले रहने और अधिक रेडिएशन के उसके शरीर पर क्या प्रभाव होते हैं? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका वैज्ञानिक जवाब ढूंढ पाएंगे, जो भविष्य के मिशन के लिए मददगार होंगे. अगर हम मंगल ग्रह को अपना ठिकाना बनाना चाहते हैं तो उससे पहले हमें चंद्रमा पर ऐसा करके दिखाना होगा. चंद्रमा पर स्पेस स्टेशन के जरिए हम ये सीख पाएंगे कि पृथ्वी से दूर बेस को कैसे संचालित करना है और उसे जरूरी सामान कैसे डिलीवर करना है. एक तरीके से मंगल पर इंसानी बस्ती बसाने से पहले चंद्रमा पर बेस बनाना एक ‘टेस्ट’ की तरह होगा.

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चंद्रमा पर स्थित एक स्टेशन (सांकेतिक तस्वीर)

चंद्रमा पर अब तक बेस क्यों नहीं है और इसमें चुनौतियां क्या हैं?

अगर इस सवाल का एक लाइन में उत्तर दिया जाए, तो वह ये होगा कि हम चंद्रमा पर इंसानों को अक्सर भेजते ही नहीं हैं. अभी तक सिर्फ छह बार एस्ट्रोनोट्स को चंद्रमा पर भेजा गया. वहीं, आखिरी बार ऐसा 1972 में अपोलो मिशन के तौर पर किया गया. इसके अलावा, चंद्रमा पर इंसानों को भेजने के लिए सेटर्न वी जैसे शक्तिशाली रॉकेट का इस्तेमाल किया गया, जो अब बनाया नहीं जाता है. इससे ये बात सामने आती है कि हमारे पास अभी ऐसा कोई भी शक्तिशाली रॉकेट नहीं है, जिससे हम इंसानों को चंद्रमा पर भेज पाएं. ऐसे में चंद्रमा पर स्पेस स्टेशन बनाना दिन में सपने देखने जैसा है.

वहीं, अगर हम मान लेते हैं कि हम सेटर्न वी जैसा रॉकेट फिर से बना लेंगे, क्योंकि ऐसा तो हमने पहले भी किया है. लेकिन इतने भर से ही चंद्रमा पर इंसानों की बस्ती बनाने का काम पूरा नहीं हो जाता है. दरअसल, हमें पृथ्वी पर स्पेस स्टेशन के हिस्से को तैयार करना होगा, फिर उसे चंद्रमा पर ले जाकर असेंबल करना होगा. ऐसा ही ISS के साथ किया गया था. हालांकि, ISS पृथ्वी से 400 किलोमीटर दूर है, जबकि चंद्रमा की दूरी 3,84,000 किमी है. चंद्रमा की प्रत्येक यात्रा में लगभग तीन दिन लगेंगे और इसके लिए बड़ी मात्रा में ईंधन की आवश्यकता होगी. इस तरह चंद्रमा पर बेस बनाने में बहुत अधिक वक्त लगेगा.

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चंद्रमा पर इस तरह के वाहनों में रहेगा इंसान

इन चुनौतियों से भी पार पाना होगा

एक पल के लिए हम मान लेते हैं कि इंसानों के लिए चंद्रमा पर स्पेस स्टेशन बना दिया गया है. इसका मतलब ये नहीं है कि काम पूरा हो गया. इस स्पेस स्टेशन और इंसानी कॉलोनियों में लोगों के लिए फूड सप्लाई, बिजली, बिजली के उपकरण और सांस लेने के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई भी सुनिश्चित करनी होगी. इंसान ISS पर सब्जी उगाकर अंतरिक्ष में सब्जी उगाने में तो सफल हो चुका है. लेकिन बिजली पैदा करना असली चुनौती होगी. बिजली के लिए सोलर एनर्जी पर निर्भर रहा जा सकता है. लेकिन चंद्रमा हर 28 दिनों में एक चक्कर लगाता है. इसका मतलब है कि चंद्रमा पर एक निश्चित स्थिति में स्पेस स्टेशन के पास 14 दिनों की सूर्य की रोशनी होगी. फिर अगले 14 दिनों तक इसे अंधेरे में रहना होगा. बिना रोशनी के सोलर एनर्जी से चलने वाले उपकरण को बैटरी पर निर्भर रहना होगा. अगर बैटरी में दिक्कत आई तो वहां रहने वाले इंसानों की मुसीबत बढ़ जाएगी.

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