दीदी के देवर के प्रपोजल से किया इनकार तो फेंका तेजाब, जला हुआ चेहरा लेकर वो बन गई बड़ी शख्सियत

मुंबई. लड़कियों की ना किसी को असानी से समझ नहीं आती। लड़कियों की ना पुरुषों से झेली नहीं जाती वो उनाक ईगो और अंहकार टूट जाता है। ऐसे में वो बदला लेने के लिए लड़की को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे एक लड़की ने अपनी आपबीती साझा की है। इस कहानी को सुन किसी की भी आंखें नम हो जाएं। ये कहानी है शीरोज नाम की संस्था की एक एसिड अटैक पीड़िता की है। उसने अपना नाम बताए बिना अपनी कहानी दुनिया के सामने रखी है।

अर्पणा (काल्पनिक नाम) ने बताया कि वो एक गरीब परिवार में पली-बढ़ी हैं। ऐसे परिवार से जो दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च एक साथ नहीं उठा सकता। ऐसे में उनका भाई पढ़ने जाता था और वो घर पर रहकर उसकी पुरानी किताबों को समझने की कोशिश करती थीं। पिता की मौत के बाद भाई ने घर की जिम्मेदारी संभाल ली और गार्ड की नौकरी करने लगा।

बड़ी बहन के ससुराल गई थी मैं

भाई का हाथ बंटाने के लिए मैं दूसरों के घरों में नौकरानी का काम करने लगी। ऐसे में मैं दूसरों के घर काम करके अच्छा कमाने लगी। पैसे कमाने की इस लत ने मुझे सपने देखना भी सिखा दिया। फिर साल 2002 में मेरी बड़ी बहन का गर्भपात हो गया। मैं और मेरी मां उसे देखने उसके ससुराल गए।

(पीड़िता)

देवर ने किया प्रपोज

वहां दीदी के देवर ने मुझ पर डोरे डालना शुरू कर दिया। मैं उस समय मात्र 16 साल की थी। मुझे उसका व्यवहार काफी अजीब लगता था। वो लगातार मुझे परेशान करने लगा और प्रपोज कर दिया। मैंने उसके प्रपोजल पर ध्यान नहीं दिया और इनकार कर दिया। मुझे उस वक्त शादी नहीं करनी थी और न ही घर बसाकर किसी की पत्नी बनकर रह जाना था।

मेरी नहीं हो सकती तो, किसी की नहीं होगी कह फेंका तेजाब

हम कुछ दिन दीदी के घर ठहरे थे, ऐसे में एक दिन वो कमरे में आया मैं बाहर जाने लगी तो उसने अचानक मेरे ऊपर कुछ गरम पानी सा फेंक दिया और चिल्लाया कि, तू मेरी नहीं हो सकती तो, किसी की नहीं होगी। मुझे थोड़ी देर के लिए लगा कि वो गर्म फेंका होगा लेकिन मेरा चेहरा जलने लगा और मैं दर्द के मारे बुरी तरह चिल्लाने लगी। तब भी मुझे नहीं पता था कि उसने मेरे ऊपर तेजाब यानि एसिड फेंका है।

रिश्तेदारों ने दी मारने की सलाह

इसके बाद मेरी मां मुझे अस्पताल लेकर गई। तीन साल तक मेरी सर्जरी चलती रहीं। रिश्तेदार मां और भाई को सलाह देते कि मैं किसी काम की नहीं रही हूं, मुझे मार डालना चाहिए, या अनाथ आश्रम छोड़ दें। फालतू इलाज में पैसे खर्च न करें।

पति ने पैसों के लिए की शादी

मैंने भी जिंदगी से सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं। मैं जीना चाहती थी, नॉर्मल लाइफ में खेलना हंसना चाहती थी, मैं भी शादी करना चाहती थी। पर मुझे सिर्फ रिएक्शन मिले। फिर साल 2010 में मैं एक शख्स से मिली और हमने शादी कर ली लेकिन वो भी एक बुरा सपना ही निकला। मेरे पति ने मुझसे शादी सिर्फ पैसों के लिए की थी, ताकि वो मेरे भाई से मोटी रकम ऐंठ सके।

(बेटे के साथ पीड़िता अपर्णा)

बेटे को मानती हैं जीने की वजह

पर मेरी जिंदगी में रोशनी की किरण बनकर आया मेरा बेटा। उसने मेरी अंधेरों से भरी जिंदगी में उजाला कर दिया और पहली और आखिरी जीने की वजह बन गया। पति को छोड़ मैं अपने बच्च को पालने लगी। मैं उसे दुनिया की हर खुशी देना चाहती थी इसलिए नौकरी ढूंढ़ने लगी। एक दिन अखबार में एक विज्ञापन देखा यहां एसिड अटैक पीड़ित महिलाओं को नौकरी दी जा रही थी। मैंने अप्लाई कर दिया और नौकरी मिल गई।

ऐसी मिली नौकरी और बन गईं स्टार

अर्पणा ने ह्यमंस ऑफ बाम्बे पेज पर बताया शीरोज नाम की इस संस्था ने मेरी जिंदगी की कायापलट कर दी। उन्होंने कहा- इसने मुझे उस दुनिया से बाहर ला दिया जहां मुझे चेहरा ढंकरकर बाहर निकलना पड़ता था। अब मैं जींस टीशर्ट पहनकर बिना चेहरा ढांके घूमती हूं और शीरोज के तौर पर काम कर रही हूं। मैं आर्थिक रूम से भी मजबूत हो गई हूं और अपने बेटो को सारी खुशियां दे सकती हूं।

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