धूनीवाले दादाजी दरबार:न चंदा न पंडा और न धंधा… यहां चलता है सिर्फ डंडा; दादाजी भक्तों की पहचान है अनुशासन और मर्यादा

 

दादाजी धूनीवाले मंदिर। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar

दादाजी धूनीवाले मंदिर। (फाइल फोटो)

न चंदा न पंडा और न धंधा… यहां चलता है सिर्फ डंडा, वो भी श्री दादाजी धूनीवाले का। खंडवा में दादाजी धूनीवाले का दरबार जहां प्रतिवर्ष गुरु पूर्णिमा पर करीब 5 लाख से ज्यादा भक्त महाराष्ट्र राजस्थान, दिल्ली से आकर मत्था टेकते हैं। इस बार भी शुक्रवार को गुरु पूर्णिमा के मौके पर यहां खास तैयारियां की जा रही हैं। कोरोना काल में लगातार दूसरे साल भी दरबार में भक्त अनुशासित हैं।

साल 1930 में श्री केशवानंदजी महाराज श्री दादाजी ने खंडवा में जिस जगह अंतिम विश्राम किया, उसी जगह लाखों की भक्तों की आस्था का केंद्र दादाजी दरबार बना। 1942 में उनके उत्तराधिकारी श्री हरिहर भोले भगवान श्री छोटे दादाजी ने भी शरीर त्याग दिया। उन्हें भी पूरी मर्यादा के साथ ही समाधिस्थ किया गया है। गुरु शिष्य की समाधि पूरे अनुशासन और मर्यादा के साथ दर्शनीय है।

कोरोनाकाल से पहले गुरु पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं की रहती थी भीड़।

कोरोनाकाल से पहले गुरु पूर्णिमा पर श्रद्धालुओं की रहती थी भीड़।

पिछले दो साल से मायूस हैं दादाजी के भक्त

दादाजी के भक्त पिछले दो साल से मायूस हैं, क्योंकि उन्हें समाधि स्पर्श और उनके प्रत्यक्ष दर्शन नहीं मिल पा रहे। जिला प्रशासन के साथ संक्रमण रोकने के लिए किए कारगर उपायों के पालन में दादाजी दरबार ट्रस्ट अथवा भक्तों के बीच कभी ना-नुकुर नहीं हुई।

लाखों भक्तों के बावजूद हर भक्त ने मौजूदा परिस्थितियों में दूर से ही समाधि दर्शन की परिपाटी को स्वीकार कर लिया। गत साल निशान पेश तक करने की अनुमति नहीं थी, तो उसे भी सहजता से लिया। नागपुर, बैतूल, पाहुना, सीसर, छिंदवाड़ा समेत अनेक जगह से लोग सैकड़ों किमी दूर से पैदल यहां आते हैं।

स्व अनुशासित है दादाजी दरबार

ट्रस्टी सुभाष नागोरी बताते हैं, यहां आने वाले भक्त दरबार में दादाजी की प्रत्यक्ष उपस्थिति को स्वीकार करते हैं। यही कारण है, स्व अनुशासित है। दरबार के कायदों का पालन करते हैं। प्रशासन अथवा पुलिस को कभी यहां मशक्कत नहीं करना पड़ती। एक स्वयं सेवक का आदेश भी दादाजी का आदेश मानकर हजारों लोग चुपचाप खड़े रह जाते है।

यहां कोई पंडा या पुजारी नहीं

दादाजी दरबार इसलिए भी हटकर है, क्योंकि यहां पंडा अथवा पुजारी नहीं है। यहां न पूजा पाठ, अभिषेक या इत्यादि के लिए दवा है और न ही भक्तों से चंदा मांगा जाता है। सबसे बड़ी बात दरबार से जुड़ी कोई भी वस्तु, नारियल प्रसाद चादर, निशान इत्यादि कुछ बेचा नहीं जाता। जो आता है, वो भक्तों को निःशुल्क भेंट कर दिया जाता है।

छोटे व बड़े दादाजी।

छोटे व बड़े दादाजी।

91 साल से सतत जल रही अखंड धूनी

बड़े दादाजी धूनीवाले जहां भी जाते वहां धूनी रमाकर बैठते थे, इसीलिए उन्हें धूनीवाले दादाजी कहा जाता है। खंडवा में सबसे जीवंत और जागृत है। धूनी जो कि दादाजी धूनीवाले द्वारा स्वयं 1930 में प्रज्जवलित की थी। यह धूनी आज भी अखंड स्वरूप में प्रज्जवलित है। यहां 24 घंटे सातों दिन अपने से यहां धूनी में सूखे नारियल स्वाहा किए जाने की परंपरा है।

 

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