घने जंगलों-पहाड़ों के बीच बच्चों की पाठशाला:यहां मोबाइल नेटवर्क और बिजली कटौती के कारण ऑनलाइन नहीं पढ़ पा रहे थे बच्चे, शिक्षक खुद छात्रों तक पहुंचे; पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ा रहे

राजस्थान में कोरोना संक्रमण का असर फिलहाल खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में संक्रमण से छोटे बच्चों को बचाने के लिए सरकार ने सभी स्कूलों को बंद कर ऑनलाइन शिक्षण व्यवस्था शुरू की थी। लेकिन ग्रामीण अंचल में मोबाइल नेटवर्क और बिजली कटौती की वजह से आम छात्र शिक्षा से महरूम रह रहे थे। ऐसे में उदयपुर के कुछ शिक्षकों ने अब “चल-गुरुकुल” की शुरुआत की है। जिसके तहत शिक्षक अब गांव-गांव पहुंच गुरुकुल की तर्ज पर घने जंगलों के बीच आम छात्रों को पढ़ा रहे हैं।

पेड़ की छांव के नीचे बैठ पढ़ाई करते छात्र।

पेड़ की छांव के नीचे बैठ पढ़ाई करते छात्र।

जहां चाह, वहां राह
उदयपुर से 25 किलोमीटर दूर बने सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय काया के प्रिंसिपल मोहन लाल ने बताया कि कोरोना महामारी के बाद आम छात्र शिक्षा से दूर हो गए थे। ऐसे में सरकार द्वारा ऑनलाइन शिक्षण व्यवस्था की शुरुआत तो की गई। लेकिन घने जंगलों के बीच बसे गांवों में मोबाइल नेटवर्क नहीं आता था। वहीं कुछ स्थानों पर बिजली कटौती छात्रों के लिए परेशानी का कारण बन रही थी। जिस वजह से पिछले लंबे वक्त से छात्र पढ़ नहीं पा रहे थे। ऐसे में हमने अब गांव-गांव जाकर आम छात्रों के परिजनों के बीच ही प्राकृतिक वातावरण में उन्हें पढ़ाने की मुहिम शुरू की है। जिसमें अब छात्र और उनके परिजन भी पूरी मदद कर रहे हैं।

छात्रों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए हर दिन किया जाता है योगाभ्यास।

छात्रों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए हर दिन किया जाता है योगाभ्यास।

योगाभ्यास भी कर रहे छात्र
काया स्कूल के PTI घनश्याम ने बताया कि कोरोना संक्रमण की वजह से फिलहाल छात्र अपने घरों में हैं। ऐसे में उन्हें शिक्षा के साथ जोड़े रखने के साथ ही अब हम उनके स्वास्थ्य की देखभाल भी कर रहे हैं। इसके तहत हम उन्हें प्रतिदिन योगाभ्यास के साथ कुछ खेल भी खिलाते हैं। ताकि पढ़ाई के साथ आम छात्र शारीरिक और मानसिक रूप से भी पूरी तरह स्वस्थ और तंदुरुस्त रहे। PTI घनश्याम ने बताया की हमने चल गुरुकुल को प्राकृतिक वातावरण हरे भरे पेड़ के नीचे शुरू किया है। इस वजह से बच्चे पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति को भी नजदीक से समझ रहे हैं।

पथरीली पहाड़ियों में शिक्षकों ने बनाया अनूठा गुरुकुल।

पथरीली पहाड़ियों में शिक्षकों ने बनाया अनूठा गुरुकुल।

अब तक पांच स्थानों पर शुरू हुआ “चल-गुरुकुल”
घने जंगलों के बीच जाकर आम छात्रों को पढ़ाने वाली टीचर लक्ष्मी ने बताया कि गांव में बिजली कटौती एक बड़ी समस्या है। इसके साथ ही कुछ परिवार ऐसे भी हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं कि परिवार में एंड्रॉयड फोन हो। इस वजह से छात्र पिछले लंबे समय से पढ़ नहीं पा रहे थे। ऐसे में आम छात्रों की समस्या को ध्यान में रखते हुए काया स्कूल के शिक्षकों द्वारा चल गुरुकुल मुहिम की शुरुआत की गई। जिसके तहत अब तक काया पंचायत समिति के 5 गांव में आम छात्रों और परिजनों के बीच प्राकृतिक वातावरण में ही शिक्षक आम बच्चों को पढ़ा रहे हैं। ताकि महामारी के इस दौर में भी छात्र दूसरे छात्रों के मुकाबले पिछड़ ना जाये।

जंगल में कोरोना गाइडलाइन के अनुरूप छात्रों को दिया जाता है प्रवेश।

जंगल में कोरोना गाइडलाइन के अनुरूप छात्रों को दिया जाता है प्रवेश।

घने जंगलों में भी कोरोना गाइडलाइन का रखा जा रहा ध्यान
काया पंचायत समिति के घने जंगलों में शुरू हो चुके चल गुरुकुल में कोरोना गाइडलाइन का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। छात्रों के खुले विद्यालय में प्रवेश के साथ ही उनका टेंपरेचर नापा जाता है। साथ ही हाथ सैनिटाइज कर सोशल डिस्टेंसिंग के आधार पर ही छात्रों को बिठाया जाता है। बकायदा इसके लिए शिक्षकों द्वारा पहाड़ को खोद 3 सीढ़ियों पर छात्रों के बैठने की व्यवस्था की गई है। जहां आसानी से छात्र बोर्ड को देखने के साथ ही शिक्षक से सीधा संवाद कर सकता है।

काया सरकारी स्कूल के शिक्षक पढ़ाई के साथ ग्रामीणों के स्वास्थ्य की भी कर रहे देखभाल।

काया सरकारी स्कूल के शिक्षक पढ़ाई के साथ ग्रामीणों के स्वास्थ्य की भी कर रहे देखभाल।

छात्रों के साथ ग्रामीणों की मदद कर रहे शिक्षक
सप्ताह में 6 दिन चलने वाले चल गुरुकुल में हर दिन 3 शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जाती है। जहां प्रतिदिन विषय विशेषज्ञ शिक्षक छात्रों को पढ़ाने के साथ ही, उन्हें होमवर्क भी देते हैं। ताकि छात्र महामारी के इस दौर में भी शिक्षा से जुड़े रहें। इसके साथ ही शिक्षक ग्रामीण अंचल के जरूरतमंद लोगों तक राशन और दवाइयां भी पहुंचा रहे हैं। ताकि गांव में फिर से कोरोना महामारी दस्तक ना दे।

काया पंचायत समिति में अब तक 5 साल गुरुकुल किए जाते हैं शुरू।

काया पंचायत समिति में अब तक 5 साल गुरुकुल किए जाते हैं शुरू।

शिक्षकों ने तनख्वाह देकर की ग्रामीणों की रक्षा
बता दें कि इससे पहले काया गांव के शिक्षकों द्वारा ही ग्रामीण इलाके में कोरोना के खिलाफ अभियान चलाया गया था। जिसमें शिक्षकों ने अपना वेतन देकर घर-घर दवाई और राशन सामग्री वितरित की थी। इसके साथ ही पूरे गांव में सर्वे कर एक डेटाबेस भी तैयार किया था। जिससे अब काया पंचायत समिति के ग्रामीण इलाके में संक्रमण का नामो-निशान खत्म हो गया है।

गुरु हों तो ऐसे:उदयपुर के एक गांव में सरकारी टीचर्स की अनूठी मुहिम, कोरोना से बच्चों और उनके परिवारों को बचाने के लिए अपनी सैलरी से बनाया फंड

 

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