स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद : मनुस्मृति बयानबाजी को बताया सनातन विरोधी, कहा- असत्य और भ्रम फैलाना तुरंत बंद करें कांग्रेस नेता
छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और धार्मिक गलियारों से इन दिनों एक बहुत बड़ी और तीखी बयानबाजी सामने आ रही है, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Shankaracharya Swami Avimukteshwaranand Saraswati) ने देश के प्रमुख विपक्षी नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर बेहद कड़ा हमला बोला है। छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के दौरे के दौरान और वहां से जारी किए गए एक आधिकारिक प्रेस नोट के माध्यम से शंकराचार्य ने राहुल गांधी द्वारा हिंदू धर्मग्रंथ 'मनुस्मृति' को लेकर दिए गए बयानों पर कड़ी आपत्ति जताई है। शंकराचार्य ने दो टूक शब्दों में कहा है कि राहुल गांधी की यह मानसिकता पूरी तरह से सनातन विरोधी और धर्मशास्त्र विरोधी है, और उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए हिंदू धर्म के ग्रंथों के खिलाफ असत्य तथा भ्रम फैलाने वाले बयान देना तुरंत बंद कर देना चाहिए। उनके इस आक्रामक रुख के बाद से कांग्रेस और साधु-संतों के बीच वैचारिक टकराव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है, जिससे राजनीतिक बाजारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
क्या था राहुल गांधी का वह बयान जिस पर भड़के ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य?
पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब राहुल गांधी ने अपने विभिन्न जनसभाओं और भाषणों के दौरान प्राचीन भारतीय ग्रंथ 'मनुस्मृति' और सामाजिक व्यवस्था को लेकर कुछ ऐसी टिप्पणियां की थीं जिन्हें विपक्षी नेताओं और आलोचकों ने हिंदू धर्म की मान्यताओं पर हमला करार दिया था। राहुल गांधी ने अपने बयानों में यह आरोप लगाया था कि इस तरह के प्राचीन ग्रंथों और व्यवस्थाओं के कारण समाज में भेदभाव और असमानता को बढ़ावा मिला है। उनके इन बयानों को लेकर देश भर के कई वैचारिक मंचों पर बहस छिड़ गई थी। इसी कड़ी में जब ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती छत्तीसगढ़ के बेमेतरा में थे, तो उन्होंने इस विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए एक प्रेस नोट जारी किया। शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि बिना ग्रंथों के वास्तविक अध्ययन और उनके संदर्भ को समझे बिना इस प्रकार की भ्रामक बातें करना न केवल सनातन धर्म का अपमान है, बल्कि यह देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करने का एक सुनियोजित प्रयास भी है।
शंकराचार्य के कड़े शब्द: "सनातन विरोधी मानसिकता और भ्रमित प्रचार स्वीकार नहीं"
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने बयान में बहुत कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि आज के समय में राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए सनातन धर्म, उसके ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं को निशाना बनाना एक फैशन बन गया है, जिसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि धर्मशास्त्रों के अपने नियम और ऐतिहासिक संदर्भ होते हैं, और उन्हें राजनीतिक चश्मे से देखकर जनता के बीच गलत संदेश फैलाना सरासर अनुचित है। शंकराचार्य ने जोर देकर कहा कि सनातन धर्म हमेशा से सहिष्णुता, न्याय और सबका कल्याण चाहने वाला धर्म रहा है, लेकिन कुछ राजनीतिक दल अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए जानबूझकर हिंदू समाज में भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि इस तरह के असत्य और भ्रामक प्रचार से देश की वैचारिक एकता को नुकसान पहुंच रहा है, जिसे देश का संत समाज कभी सफल नहीं होने देगा।
छत्तीसगढ़ की धरती से उठी वैचारिक गूंज और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर
छत्तीसगढ़ के बेमेतरा से शंकराचार्य द्वारा उठाया गया यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य और देश की राजनीति में वैचारिक ध्रुवीकरण काफी तेज हो चुका है। छत्तीसगढ़ में इस बयान के आने के बाद से ही राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी आनी शुरू हो गई हैं। जहां एक तरफ सत्ता पक्ष और धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों ने शंकराचार्य के इस बयान का समर्थन करते हुए राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी पर जमकर निशाना साधा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी नेताओं का यह कहना है कि उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है और वे हमेशा संविधान तथा सामाजिक न्याय के पक्ष में बात करते हैं। इसके बावजूद, शंकराचार्य जैसे सर्वोच्च आध्यात्मिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस प्रकार खुलकर किसी राष्ट्रीय नेता के बयानों की आलोचना करना यह साबित करता है कि धार्मिक ग्रंथों और आधुनिक राजनीति का यह टकराव आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ने वाला है।
धर्मशास्त्रों की गरिमा और राजनेताओं के बयानों की बढ़ती सीमाएं
यह पूरा घटनाक्रम इस बात पर गंभीर सवाल खड़े करता है कि क्या राजनीतिक लाभ के लिए प्राचीन ग्रंथों और धार्मिक मान्यताओं का इस तरह सार्वजनिक मंचों पर उपयोग करना उचित है। भारत जैसी विविधता से भरी संस्कृति में जहां आस्था और धर्म का लोगों के जीवन में एक विशेष स्थान है, वहां इस तरह के बयान अक्सर गहरी सामाजिक और राजनीतिक बहस का रूप ले लेते हैं। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह बयान केवल एक तीखी प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति के संरक्षकों की ओर से दी गई एक वैचारिक चेतावनी है कि धर्म और ग्रंथों के मामलों में बयानबाजी करते समय राजनीतिक मर्यादाओं का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। जैसे-जैसे देश में चुनावी सरगर्मी और वैचारिक बहस तेज होगी, यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहेगा, और जनता भी यह देख रही है कि कैसे आस्था और राजनीति के इस खेल में शब्दों के बाण लगातार चलाए जा रहे हैं।