बेगूसराय का ग्रेजुएट चाय वाला, बेरोजगारी का रोना रोने वालों के मुंह पर लगा रहा तमाचा

बेगूसराय, 24 नवम्बर (हि.स.)। आज युवक-युवतियां उच्च शिक्षा ग्रहण कर सरकारी नौकरी का इंतजार कर रहे हैं, बेरोजगारी का रोना रो रहे हैं। लेकिन इस दौर में बड़ी संख्या में युवा आत्मनिर्भर बनने के लिए रोजगार नहीं खोज रहे हैं। नौकरी नहीं खोज रहे हैं, बल्कि स्वरोजगार करके नौकरी देने वाले बन रहे हैं।

ऐसा ही एक युवक है संतोष कुमार। जिसने स्वरोजगार के रास्ते आत्मनिर्भरता के लिए ”ग्रेजुएट चाय वाला” के नाम से चाय का स्टॉल शुरू किया है। राह चलता हर कोई एक बार जरूर जिज्ञासा बस इस ग्रेजुएट चाय वाले के पास रुकता है। बेगूसराय के एसबीएसएस (को-ऑपरेटिव) कॉलेज से राजनीति शास्त्र में स्नातक (ग्रेजुएशन) कर रहे संतोष ने ग्रेजुएट चायवाला के नाम से अपना स्टॉल कॉलेज के बगल में ही शुरू किया है।

खगड़िया जिला के भदास निवासी सुरेश साह का पुत्र संतोष कुमार बेगूसराय में किराए के मकान में रहकर स्नातक की पढ़ाई कर रहा है। स्नातक की पढ़ाई के दौरान जब उसने तीनों वर्ष की परीक्षा दे दी तो मन में उच्च शिक्षा का भाव है, लेकिन पैसे का आभाव दिखा। इसके विकल्प में उसने बुधवार से पांच सौ रुपये की लागत से अपना चाय का स्टॉल शुरू कर दिया।

कॉलेज के बगल में एनएच किनारे चाय की दुकान पर उसने पूंजी के अभाव में ग्राहकों की बैठने की व्यवस्था नहीं की है। लेकिन ग्रेजुएट चायवाला का बैनर जरूर लगाया है तथा चाय पीने वालों को पैसा देने के लिए कोई झंझट नहीं है, गूगल पे और फोन पे की व्यवस्था है। पहले दिन बुधवार को जब उसने अपना काम शुरू किया तो दुकान पर 65 ग्राहक आए। इससे आशा जगी और गुरुवार को उसने दो सौ ग्राहकों के लिए दूध खरीद लाया, जिसमें से 70 से अधिक चाय दोपहर 12 बजे तक बिक चुके हैं।

संतोष ने बताया कि पिछले तीन वर्षो से किराए के मकान में रहकर राजनीति शास्त्र की पढ़ाई करता है। पिछले दिनों उसकी अंतिम वर्ष (ऑनर्स पेपर) की परीक्षा खत्म हो गई तो उच्च शिक्षा के लिए उसे और पैसों की आवश्यकता है। लेकिन इसके लिए वह अपने पिता पर ही आश्रित नहीं रहना चाहता है और पॉकेट खर्च से बचाए गए पांच सौ रुपये की लागत से स्टॉल शुरू किया है। सुबह छह बजे से शाम पांच बजे तक चाय बेचेगा और उसके बाद अपनी पढ़ाई करेगा।

चाय का स्टॉल शुरू करने के लिए उसने सिर्फ दूध, चायपत्ती, चीनी, कप और केतली खरीदा है। चूल्हा डेरा से लाकर दुकान पर रखता है और शाम में फिर चूल्हा घर ले जाकर इसी पर खाना भी बनाएगा। पूंजी नहीं है, इसलिए अभी ग्राहकों के बैठने की कोई व्यवस्था नहीं है। चाय बेचना शुरू करने का उद्देश्य सिर्फ अपनी पढ़ाई का खर्च पूरा करना नहीं है। बल्कि बेरोजगारी का रोना रोने वालों को जागरूक करना भी है। उच्च शिक्षा हम अपने ज्ञानवर्धन के लिए हासिल कर रहे हैं, मन में सरकारी नौकरी की आशा सबको रहती है। अभिभावकों की इच्छा रहती है कि पढ़ लिखकर मेरा बच्चा सरकारी नौकरी करे। लेकिन सिर्फ इसके भरोसे समाज और देश आगे नहीं बढ़ेगा।

स्वरोजगार भी बेरोजगारी समाप्त करने का एक बेहतर माध्यम है, यह हमें आर्थिक समृद्ध कर आत्मनिर्भर बनाएगा। संतोष ने बताया कि जिनको अपने काम पर भरोसा होता है वह नौकरी करते हैं, लेकिन जिनको अपने आप पर भरोसा होता है वह व्यापार करते हैं। यह लाइन उसने अपने ग्रेजुएट चाय वाले बैनर पर भी लिखवाया है, ताकि लोग जागरूक होकर स्वरोजगार को अपने उन्नति का रास्ता बनाएं। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी करना ही नहीं, नौकरी देना भी होना चाहिए।

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