हुकुमचंद मिल की जमीन बेचने के लिए मजदूर ने हाई कोर्ट में लगाई अर्जी

  • 1991 में मिल बंद होने के बाद से अब तक अपने हक के पैसे के लिए संघर्ष कर रहे हैं मजदूर
  • पैसे मिलने के इंतजार में 2000 से अधिक मजदूरों की हो चुकी है मौत, 2007 में कोर्ट ने 229 करोड़ रुपए क्लेम स्वीकृत किया था

 

इंदौर. अपने हक के पैसों के लिए पिछले 28 सालों से संघर्ष कर रहे हुकुमचंद मिल के मजदूरों ने मिल की जमीन बेचने के लिए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में अर्जी दायर की है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस अर्जी की सुनवाई कर जमीन बेचने के आदेश किए जाने की मांग की गई है। मजदूर नेता हरनाम सिंह धालीवाल नरेंद श्रीवंश ने यह अर्जी दायर की है। अर्जी में उल्लेख किया है कि मजदूरों की हालत बहुत खराब होती जा रही है। जमीन का उपयोग बदला जा चुका है, अब केवल जमीन के लीज अधिकार नीलाम किए जाना है। लगभग ढाई दशक से मजदूर अपने हक के पैसों इंतजार कर रहे हैं। हाई कोर्ट जल्द ही इस अर्जी पर सुनवाई कर सकती है।

जब मिल बंद हुई तक 5895 मजदूर काम करते

12 दिसंबर 1991 को हुकुमचंद मिल प्रबंधन ने बगैर किसी सूचना के मिल को बंद कर दिया था। इसके बाद से ही मजदूर ग्रेच्युटी, तनख्वाह और अन्य लेनदारियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मिल की जमीन बेचकर मजदूरों का भुगतान किया जाना है। जिस वक्त मिल बंद हुई थी, उसमें 5895 मजदूर काम करते थे। 6 अगस्त 2007 को हाई कोर्ट ने मिल मजदूरों के पक्ष में 229 करोड़ रुपए का क्लेम स्वीकृत किया था। मिल की 42.5 एकड़ जमीन बेचकर मजदूरों के पैसों का भुगतान किया जाना था लेकिन मिल की जमीन पर मप्र शासन ने अपना अधिकार बताते हुए इसे बिकने से रोक दिया था। निगम और राज्य शासन दोनों इस जमीन पर अपना अधिकार बता रहे थे। मई 2018 में हाईकोर्ट ने मिल की जमीन पर मप्र सरकार के दावे को खारिज कर दिया, अब नगर निगम को मिल की जमीन बेचकर मजदूरों को उनके पैसों का भुगतान करना है।

229 करोड़ में से मात्र 50 करोड़ का भुगतान 
मजदूरों को उनकी मेहनत के 229 करोड़ रुपए का भुगतान शासन को करना है। कुछ माह पहले कोर्ट के आदेश पर मजदूरों को 229 करोड़ में से 50 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया था वहीं अब शेष राशि 179 करोड़ की राशि मजदूरों में बांटी जानी है। हालांकि मजदूरों की मांग है कि 229 करोड़ रुपए के अलावा साल 1991 से अब तक इस राशि पर बने ब्याज का भुगतान भी सरकार द्वारा मजदूरों काे किया जाए।

दो हजार मजदूरों की हो चुकी हैं मौत
हुकुमचंद मिल के मजदूर 28 साल से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। मिल के 5895 मजदूरों को ग्रेच्युटी, वेतन के 229 करोड़ों रुपए का भुगतान होना है। कोर्ट ने मिल की जमीन को बेचकर मजदूरों को पैसा देने को कहा था। इसके बावजूद मिल की जमीन बिक नहीं पाई। अपने हक की इस लड़ाई में अब तक लगभग 2000 मजदूरों की मौत हो चुकी है।

  • मजदूर नेताओं का कहना है कि एक तरफ तो मुख्यमंत्री असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को तमाम तरह की सुविधाएं देने का दावा कर रहे हैं, सरकार के सारे दावे झूठे है। जमीनी स्तर पर मजदूरों को कोई सुविधा नहीं मिल रही है। हुकुमचंद मिल के ही हजारों मजदूर अपने हक के पैसों के लिए संघर्ष करते-करते मर गए लेकिन मप्र सरकार उनके पैसे देने में आनाकानी कर रही है।

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