हाथरस केस: पीड़ित परिवार की हाई कोर्ट से मांग- यूपी से बाहर ट्रांसफर हो केस, सुरक्षा देने की भी गुहार लगाई

लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने सोमवार हाथरस के बूलगढ़ी गांव में 14 सितंबर को दलित युवती के साथ कथित दुष्कर्म, मारपीट और मौत के मामले में सुनवाई की. सुनवाई में पीड़ित परिवार व लापरवाही बरतने के आरोपी अफसरों के बयान दर्ज कर लिए गए. मामले में अगली सुनवाई 2 नवंबर को होगी. कोर्ट ने मृत युवती के परिवार के पांच लोगों के साथ ही उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया सहित शीर्ष अधिकारियों तथा हाथरस के डीएम व एसपी का पक्ष जाना.

 

सुनवाई के दौरान पीड़ित परिवार ने कोर्ट के सामने तीन मांगे रखीं. पीड़िता के परिवार ने कोर्ट से कहा कि वह इस मामले को यूपी के बाहर के किसी राज्य में ट्रांसफर करने का आदेश दे. इसके अलावा परिवार ने अनुरोध किया कि सीबीआई जांच के सभी तथ्य जांच पूरी होने तक पूरी तरह से गोपनीय रखे जाएं, साथ ही जांच की अवधि में परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.

 

अदालत ने अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी, डीजीपी हितेश अवस्थी, एडीजी लॉ एंड ऑर्डर प्रशांत कुमार, डीएम प्रवीण कुमार लक्षकार और तत्कालीन एसपी विक्रांत वीर को तलब किया था.

 

कोर्ट में जैसे ही सुनवाई शुरू हुई अदालत के सवाल पर पीड़ित परिवार का दर्द छलक पड़ा. परिवार ने बताया कि हमारी मर्जी के बगैर रात में अंतिम संस्कार कर दिया गया, अंतिम संस्कार के दौरान परिवार का कोई भी साथ मौजूद नहीं था सिर्फ कुछ गांव वालों को बुलाकर वहां पर गोबर के उपले रखवा दिए गए थे. जबकि हम चाहते थे कि अंतिम संस्कार सुबह 5 बजे के बाद किया जाए , परिवार को अपनी बेटी का चेहरा देखने का एक अंतिम मौका भी नहीं मिला.

 

इसपर कोर्ट ने एडीजी प्रशांत कुमार से पूछाम अगर आपकी अपनी बेटी होती तो क्या वह बिना चेहरा देखे उसका अंतिम संस्कार होने देते ?

 

कोर्ट ने डीएम प्रवीण कुमार लक्षकार को भी कड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने डीएम से कहा, ”जिस अंतिम संस्कार में गंगाजल का इस्तेमाल होता है, उसमें आप ने केरोसिन तेल और पेट्रोल का इस्तेमाल कर शव जलाया. यह मानवाधिकार का उल्लंघन है.”

 

अपने बचाव में डीएम प्रवीण कुमार ने दलील दी कि वहां काफी लोग जमा थे, कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका की वजह से रात में अंतिम संस्कार का फैसला लिया गया. पीड़िता के परिवार ने डीएम के इस दावे का भी जोरदार तरीके से विरोध किया.

 

पीड़ित परिवार ने कहा कि उस दौरान वहां पर 200 से 300 पुलिस वाले थे और गांव के सिर्फ 50 से 60 लोग मौजूद थे. ऐसे डीएम का यह कहना कि वहां पर बहुत ज्यादा भीड़ थी, गलत है. कोर्ट में पीड़िता की भाभी ने डीएम प्रवीण कुमार के इस बयान का भी जिक्र किया जिसमें वो परिवार से कहते हो नज़र आए थे कि अगर तुम्हारी बेटी कोरोना से मर जाती तो तुम को कुछ नहीं मिलता.

 

सूत्रों के मुताबकि कोर्ट के तीखे सवालों के आगे अफसरों की बोलती बंद थी. अब 2 नवंबर को इस केस की अलगी सुनवाई होगी. प्रशासन को कोर्ट के सवालों का जवाब देना होगा . परिवार ने अदालत से सीबीआई की जांच रिपोर्ट गोपनीय रखने की भी मांग की है जिसे मान लिया गया है.

Check Also

लखनऊ:राज्यसभा चुनाव में 10वीं सीट के लिए जोर आजमाइश करेगी बसपा

लखनऊ :  उत्तर प्रदेश में अगले माह नौ नवंबर को राज्घ्यसभा की 10 सीटों पर …