हंसिए तो मुल्ला नसीरुद्दीन की तरह

जीव-जगत में हंसने-मुस्कुराने की सुविधा सिर्फ इंसान को मिली है. एक मुस्कराहट आपको सबका प्रिय बना देती है. ऐसा ही एक किस्सा मुल्ला नसीरुद्दीन का है.

मुल्ला नसीरुद्दीन को अरब के सुल्तान हमेशा अपने साथ रखते थे. नसीरुद्दीन की हाजिरजवाबी सुल्तान को बहुत भाती थी. एक बार सुल्तान का काफिला किसी रेगिस्तान से गुज़र रहा था. उन्हें दूर से कोई अंजान कस्बा दिखाई दिया. कस्बे को देखकर सुल्तान ने नसीरुद्दीन से कहा, ‘मुल्ला, चलो देखते हैं कि इस कस्बे में कितने लोग अपने सुल्तान को पहचानते हैं. तुम किसी को मेरा परिचय मत देना.’

सुल्तान ने शाही कारवां उस कस्बे के बाहर ही रुकवा दिया और कस्बे में पैदल प्रवेश किया. सुल्तान को ये देखकर आश्चर्य हुआ कि आने-जाने वालों में से किसी ने भी सुल्तान की तरफ ध्यान नहीं दिया पर हर कोई मुल्ला को देखकर मुस्कुरा रहा था. इस पर सुल्तान चिढ़कर बोला, ‘मुल्ला, मुझे यहां कोई नहीं जानता पर तुम्हें तो यहां सब पहचानते हैं.’ नसीरुद्दीन ने कहा, ‘जहांपनाह, ये लोग मुझे भी नहीं पहचानते.’ सुल्तान ने हैरत से पूछा,’फिर ये तुम्हें देखकर मुस्कुराए क्यों?’ मुल्ला नसीरुद्दीन ने बड़े अदब से कहा, ‘हुज़ूर, क्योंकि मैं इन्हें देखकर मुस्कुराया.’

ये एक छोटा-सा किस्सा मुस्कराहट की ताकत को बखूबी बयां करता है. एक मुस्कराहट से हम दूसरे के होठों पर मुस्कराहट ला सकते हैं. अनजाने को भी अपना बना सकते हैं. हंसना-मुस्कुराना तो इंसान का प्राकृतिक स्वभाव है. नन्हा शिशु बिना किसी कारण के मुस्कुराता है. उसकी हंसी निर्मल और स्वार्थहीन होती है. परंतु जैसे-जैसे शिशु, बालपन और किशोरावस्था की ओर बढ़ता है, उसकी हंसी कम होती जाती है. युवावस्था आते-आते चेहरे पर तनाव जगह बनाने लगता है. ऐसे में मुस्कान ईद का चांद बन जाती है.

एक शेर कुछ इस तरह है- खुल के हंसना तो सबको आता है, लोग तरसते हैं इक बहाने को. आज लोगों को वो बहाना ही नहीं मिल पाता, जिसकी वजह से वे हंस-मुस्कुरा सकें. आजकल रोज़ी-रोटी के झमेलों में मध्यवर्ग इतना फंस गया है कि परिवार और मित्रों के संग हल्के-फुल्के लम्हों की कमी हो गई है. काम की अधिकता और समय-सीमा वाले लक्ष्य, तनाव को बढ़ावा देते हैं. लेकिन अगर आप इन तनावों में भी मुस्कुराते रहें तो तनाव को पराजित कर सकते हैं. संकटों के बीच मुस्कराहट को खींच लिया जाए तो संकट की प्रवणता कम हो जाती है. जिन्होंने अपनी मुस्कराहट को आदत बना लिया है उनके चेहरे देखकर ताज़गी का एहसास होता है. ऐसा लगता है कि गर्म लू के थपेड़ों के बीच ठंडी हवा का झोंका आ गया हो. मुस्कुराने वाले सकारात्मक सोच वाले होते हैं. ऐसे लोग अपनी परिस्थितियों से डरकर मुस्कराहट का साथ नहीं छोड़ते. वे तो बस यही शेर गुनगुनाते हैं- हुजूमे गम मेरी फितरत बदल नहीं सकते, क्योंकि मेरी आदत है मुस्कुराने की.

ऐसे लोग जहां भी जाते हैं, भारी और बोझिल वातावरण को भी हल्का और विनोदपूर्ण बना देते हैं. उनका सन्देश यही होता है कि अपनी मुस्कान से दुनिया के सारे दुःख-दर्द मिटा डालो और मन हमेशा बच्चे की तरह चंचल रखो जिससे मुस्कुराने के लिए अगली बार किसी वजह की ज़रूरत न पड़े.

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