साइबेरिया के ऊपर तापमान बढ़ने से ध्रुवीय चक्रवात का खतरा बढ़ा, इस बार उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में सर्दी ढा सकती है सितम

 

लंदन : साइबेरिया के ऊपर के स्ट्रैटोस्फेयर का तापमान अचानक बढ़कर 37 डिग्री सेल्सियस हो गया है। ऊपरी हवा में तापमान का बढ़ना इस बात की ओर इशारा है कि उत्तरी ध्रुव पर पोलर वॉर्टेक्स यानी ध्रुवीय चक्रवात आने वाला है। यानी धरती के उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में सर्दी का सितम बढ़ने वाला है। क्योंकि, स्ट्रैटोस्फेयर का गर्म होने का मतलब है कि आर्कटिक सर्किल में नीचे की तरफ ठंडी हवा का घेरा बनना शुरू हो चुका है। यह एक खतरनाक संकेत हो सकता है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार साइबेरिया के ऊपर स्ट्रैटोस्फेयर यानी समताप मंडल में तापमान आमतौर पर जनवरी के पहले हफ्ते में बढ़ता है। इस दौरान यह माइनस 33 डिग्री सेल्सियस से माइनस 13 डिग्री सेल्सियस तक जाता है, लेकिन इस बार इसमें अचानक से तापमान बहुत ज्यादा बढ़ गया है। यह सही इशारा नहीं है। इसका छोटा सा नजारा अमेरिका के लेक मिशिगन में देखने को मिल रहा है। लेक मिशिगन पूरी तरह से जम गई है। स्ट्रैटोस्फेयर की गर्म हवा बेहद सर्द पोलर वॉर्टेक्स यानी ध्रुवीय चक्रवात को असंतुलित कर उत्तरी ध्रुव से बाहर भेज रही है।

 

यानी हांड कंपाने वाली सर्द हवा अब उत्तरी गोलार्द्ध के कई देशों को कंपाएगी। इसका सबसे ज्यादा असर अमेरिका और यूरोप पर पड़ेगा। अमेरिका और यूरोप तक यह अगले हफ्ते तक पहुंचने की संभावना है। यह करीब फरवरी की शुरूआत तक रहेगा। नेशनल जियोग्राफिक में छपी रिपोर्ट के अनुसार पोलर वॉर्टेक्स यानी ध्रुवीय चक्रवात नॉर्थ पोल के ऊपरी वायुमंडल में चलने वाली तेज चक्रीय हवाओं को बोलते हैं। कम दबाव वाले मौसम की वजह से ध्रुवीय चक्रवात उत्तरी ध्रुव पर ही रुका रहता है। यानी आर्कटिक इलाके में इसका असर होता है। धरती के वायुमंडल में दो ध्रुवीय चक्रवात हैं। दोनों अलग-अलग ध्रुवों पर मौजूद हैं। नॉर्थ पोल यानी उत्तरी ध्रुव पर चलने वाले पोलर वॉर्टेक्स का व्यास 1,000 किलोमीटर होता है। यह अपना आकार कम-ज्यादा करता रहता है।

 

साउथ पोल यानी दक्षिणी ध्रुव पर यही चक्रवात घड़ी की दिशा में घूमता है। सामान्य शब्दों में कहें तो जब आर्कटिक वायु में विस्फोट होने की वजह से जो ठंडी हवा धरती उत्तरी इलाकों में फैलती है, उसे पोलर वॉर्टेक्स कहते हैं। पोलर वॉर्टेक्स यानी ध्रुवीय चक्रवात भारत पर सीधे असर नहीं डालता, लेकिन आर्कटिक हवाएं पश्चिमी विक्षोभ और नीचे की सभी मौसम प्रणालियों को प्रभावित करती हैं।

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