समाज को इतिहास का आईना:इंटर कास्ट मैरिज के विरोध में अपनों ने बनाया था युवती को बंधक, हाईकोर्ट ने कहा-बनाने वाले ने फर्क नहीं किया तो हम कौन होते हैं…

 

शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इंटर कास्ट मैरिज के विरोध के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। -फाइल फोटो - Dainik Bhaskar

शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इंटर कास्ट मैरिज के विरोध के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। -फाइल फोटो

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में इंटर कास्ट मैरिज के विरोध में युवती को बंधक बनाए जाने के मामले में बड़ा फैसला आया है। कोर्ट ने न सिर्फ प्रेमी जोड़े की सुरक्षा यकीनी बनाने के लिए सरकार को निर्देश दिया है, बल्कि परिजनों को नसीहत देते हुए बड़ी टिप्पणी भी की है। कोर्ट ने अपने फैसले में श्रीमद्भागवत गीता के अलावा, सत्यवती-शांतनु, दुष्यंत-शकुंतला, सत्यवान-सावित्री, देवहूति-ऋषि कर्दम, श्रीकृण-रुकमणि, अर्जुन-सुभद्रा समेत तमाम पौराणिक कथाओं का उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि जब बनाने वाले ने फर्क नहीं किया तो फिर जातिगत अंतर पैदा करने वाले हम कौन होते हैं।

दरअसल, एक युवक ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी कि वह जिस युवती से शादी करना चाहता है, विजातीय होने के कारण उसके परिजन सहमत नहीं हैं। यहां तक कि उसकी प्रेमिका को उसके घर वालों ने बंधक बना रखा है। मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित युवती की भी कोर्ट में गवाही हुई। उसने कोर्ट को बताया, उसके परिजन नहीं चाहते कि वह याचिकाकर्ता से विवाह करे। इसकी वजह केवल जातिगत भेद ही है।

जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर की अदालत ने सभी पक्षों की सुनवाई करने के बाद शुक्रवार को अपने फैसले में कहा कि जातिवाद के कारण विवाह का विरोध करना आध्यात्मिक एवं धार्मिक अज्ञानता का नतीजा है। स्वतंत्र विचार भारतीय परंपराओं का मौलिक रूप है। हालांकि कुछ लोग धर्म के नाम पर जातिगत भिन्नता को बनाए रखने के पक्षधर हैं लेकिन वो अज्ञानतावश ऐसा करते हैं। ऐसी सोच धर्म के आधार और सच्चे सार के खिलाफ है। यह सभी धर्मों का आध्यात्मिक आधार और धार्मिक संदेश है कि भगवान हर जगह हर प्राणी में है और भगवान के सामने हर प्राणी बराबर है। इतना ही नहीं मान्यताओं के अनुसार भगवान न केवल जीवित प्राणियों में है, बल्कि कण-कण में भगवान है, इसलिए जाति, लिंग, रंग, पंथ, वर्ग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए।

कोर्ट ने भगवान का संदेश मानी जाती श्रीमद्भागवत गीता का उल्लेख करते हुए कहा, ‘इसमें भी यह कहा गया है कि जो मनुष्य भगवान के बनाए प्राणियों में भेदभाव करता है या हर जगह भगवान की उपस्थिति को नहीं देखता, उसे कभी आत्मबोध और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता। धार्मिक मूल्यों के मूलस्रोत वेदों को भुलाकर कभी कभी स्मृतियों और पुराणों को आधार बनाकर जातिगत भेदभाव को प्रतिपादित किया जाता है, इसलिए वेदों में बताए मूल्यों व सिद्धान्तों के विरुद्ध कहीं भी जो कुछ जातिगत भेदभाव के बारे में लिखा गया है। उसे दरकिनार कर देना चाहिए। चाहे वह पुराणों, स्मृतियों अथवा अन्य धर्मग्रंथों में ही क्यों न कहा गया हो। वेदों में बिना किसी भेदभाव के समानता के सिद्धांत को आधार बनाकर साथ खाने, इकट्‌ठे रहने, साथ आगे बढ़ने व मिलकर काम करने की बात कही गई है, ताकि सबकी उन्नति व बराबर उत्थान हो सके। ऐसे में जाति आधारित भेदभाव न केवल संविधान के विरुद्ध है, बल्कि सत्यधर्म के विरुद्ध भी है।

कोर्ट ने कहा कि शादी करना या किसी जायज कारण से शादी न करना और शादी के लिए अपनी इच्छा से साथी चुनने का अधिकार हमारे भारतीय समाज में पुरातन काल से मान्यता प्राप्त अधिकार है। अंतर्जातीय विवाह करने की अनुमति प्राचीनकाल से रही है, लेकिन मध्यकाल की बुराइयों के चलते गलत धारणाएं उत्पन्न हो गई, जो हमारी सभ्यता व परम्पराओं के उच्च मूल्यों, सिद्धान्तों पर हावी हो गई। कोर्ट ने सत्यवती-शांतनु, दुष्यंत-शकुंतला के विवाह का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अंतर्जातीय विवाह के जाने-माने उदाहरण रहे हैं। शादी के लिए इच्छा से साथी चुनने के अधिकार की प्राचीनकाल से लेकर मान्यता का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक राजा की पुत्री सावित्री भारत उपमहाद्वीप में अपनी इच्छा के वर की तलाश में घूमी और अंततः एक लकड़हारे सत्यवान को जीवनसाथी चुना और उसे उसके पिता और समाज ने स्वीकार किया। इसी तरह एक राजा की पुत्री देवहूति ने शोधकर्ता ऋषि कर्दम से विवाह किया, जो न कोई राजा था न ही राजकुमार। उन्हें भी राजा और समाज ने स्वीकार किया।

स्वेच्छा से साथी चुनने के अधिकार का एक उदाहरण कालिदास- विद्योत्तमा की शादी का भी है। कोर्ट ने स्वेच्छा से शादी करने का सबसे पुराना उदाहरण देते हुए कहा कि सति ने अपने पिता राजा दक्षप्रजापति की इच्छा के विरुद्ध जाकर भगवान शिव से विवाह रचाया। हजारों वर्ष से पुराने भगवान कृष्ण-रुक्मणि के विवाह का उल्लेख करते हुए कोर्ट कहा कि रुक्मणि का भाई रुकमी उसकी शादी अपने मित्र शिशुपाल से करवाना चाहता था, जबकि रुकमणि भगवान श्रीकृष्ण से शादी करना चाहती थी, इसलिए उन्होंने भगवान कृष्ण को पत्र लिखकर ले जाने को कहा। ऐसा ही उदाहरण अर्जुन-सुभद्रा का है, जिसमें सुभद्रा के परिजन उसका विवाह कहीं और करना चाहते थे, जबकि वह अर्जुन से शादी करने की इच्छुक थी।

कोर्ट ने इन तमाम उदाहरहणों को देते हुए युवती के परिजनों को सीख दी, वहीं पुलिस को युवती को वांछित सुरक्षा प्रदान करने के आदेश जारी किया। कोर्ट ने कहा कि यदि इतिहास और पुरातन मूल्यों को किनारे भी रखा जाए तो भी आज हम जिस समाज में रह रहे हैं, वह संविधान से संचालित है और यहां हर हालत में कानून का राज स्थापित होना है।

 

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