लखनऊ भाजपा के फॉर्मूले पर अखिलेश ने लागू की नई सोशल इंजीनियरिंग, गैर-यादवों पर जताया भरोसा

लखनऊ (ईएमएस) भाजपा ने गैर यादव ओबीसी मतदाताओं को अपने पाले में लाकर एक अलग वोटबैंक तैयार किया है। यही बात उसकी सत्ता की चाबी साबित हुई। अब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी इसी फॉर्मूले पर अपनी नई ‘सोशल इंजिनियरिंग’ तैयार की है। परंपरागत तौर पर एमवाई (मुस्लिम-यादव) फैक्टर से इतर अखिलेश ने गैर यादव ओबीसी उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में टिकट देकर अपने ओबीसी वोटबैंक का दायरा बड़ा करने का प्रयास किया है। सपा की दूसरी सूची में शामिल 159 प्रत्याशियों में 64 ओबीसी हैं। इनमे केवल 15 यादव हैं, जबकि गैर-यादव ओबीसी प्रत्याशियों की संख्या 49 है। जाहिर है कि अखिलेश ने गैर यादव ओबीसी जातियों पर एक बड़ा दांव खेलने की कोशिश की है।

 

यूपी की ओबीसी आबादी में यादवों के बाद सबसे ज्यादा कुर्मियों की आबादी मानी जाती है। यह तकरीबन 8 प्रतिशत हैं। अखिलेश ने भी यादवों के बाद सबसे ज्यादा ओबीसी टिकट कुर्मियों को ही दिया है। इनकी संख्या 12 है। इसके अलावा पांच मौर्य, चार गड़रिया और एक लोधी को टिकट दिया गया है। अखिलेश यादव कई बार जातिगत जनगणना करवाए जाने की मांग करते रहे हैं। वह दोहराते रहे हैं- जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी। इस लिस्ट में गैर यादव ओबीसी प्रत्याशियों को जिस तरह से तरजीह दी गई है, उसे इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। जातियों को आबादी के अनुपात में टिकट बांटने की कोशिश की गई है।

 

अधिसूचना जारी होने के बाद प्रदेश सरकार में मंत्री और विधायक रहे तमाम नेताओं ने इस्तीफा देकर सपा जॉइन की थी। इस्तीफा देने वालों में ज्यादातर गैर यादव ओबीसी थे। यही नहीं, बीते साल लालजी वर्मा और आरएस कुशवाहा बसपा छोड़कर सपा में शामिल हो गए थे। इसके अलावा राम अचल राजभर इस साल की शुरुआत में ही साइकल पर सवार हुए थे। यह साफ तौर पर इशारा है कि अखिलेश काफी समय से इस फॉर्मूले पर काम कर रहे थे, जिसका असर इस लिस्ट पर साफ देखा जा सकता है।

 

आम तौर पर वैश्य जाति का झुकाव भाजपा की तरफ माना जाता है, लेकिन अखिलेश ने इस समाज के लोगों को भी अपने पक्ष में लाने की कोशिश की है। कहा जाता रहा है कि जीएसटी समेत अन्य वजहों से व्यापारी वर्ग, खासकर छोटे और मझोले व्यापारी नाराज हैं। इसी को देखते हुए अखिलेश ने वैश्यों को खुले दिल से टिकट देकर एक बड़ा दांव चला है। उन्होंने 9 वैश्यों को टिकट दिए हैं। अब देखना यह है कि उनका सोशल इंजीनियरिंग का यह दांव कितना कारगर साबित होता है।

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