यूपी पंचायत चुनाव:दारू-दाम-दबंगई के बीच मिठास का तड़का और लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट के टोटके यानी वोटों की एडवांस बुकिंग भी

यह फोटो उन्नाव की है। बीते 10 अप्रैल को पुलिस ने 200 किलो जलेबी, लगभग 1100 समोसे जब्त किए थे। 10 लोगों को गिरफ्तार किया था। - Dainik Bhaskar

यह फोटो उन्नाव की है। बीते 10 अप्रैल को पुलिस ने 200 किलो जलेबी, लगभग 1100 समोसे जब्त किए थे। 10 लोगों को गिरफ्तार किया था।

बंगाल के चुनाव में ‘मोदी संदेश’ और ‘दीदी संदेश’ या ‘खेला होबे’ और ‘जय श्रीराम’ लिखी मिठाइयां जब चुनाव मैदान में उतरीं तो 40 से 100 रुपए प्रति पीस मूल्य में खूब बिकी भीं और चर्चा में भी रहीं। लेकिन यही ‘मिठास’ जब यूपी के पंचायत चुनाव में पहुंची तो बखेड़ा खड़ा हो गया। यहां ये मिठास आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बन चुकी है और अब तक सूबे में तमाम केस ही नहीं दर्ज हुए, खासी गिरफ्तारियां भी हुई हैं।

मारकाट, धमक-धौंस, दारू-दाम-दबंगई जैसे आजमाए हुए नुस्खे साथ रखते हुए कुछ मीठे के तड़का… यूपी में पंचायत चुनाव का यह नया रंग है। सरकार ने लखनऊ सहित सूबे के 20 जिलों में नाइट कर्फ्यू (कोरोना कर्फ्यू) भले लगा रखा हो, लेकिन गांव-गंवई इलाका इस ‘कर्फ्यू’ की जद से ‘बाहर’ है। ठीक उसी तरह जैसे बिहार के चुनाव में हुआ और अब पश्चिम बंगाल के चुनाव में हो रहा है। वहां की तरह यहां भी कोरोना का कोई असर तो नहीं ही है, इसने अपने नए रंग-ढंग भी इस बार थोड़ा बदले हैं। नए ढंग में कुछ अतिरिक्त मिठास घुली है। कहीं गिटार के तार पर निकल रही धुन के साथ बदलते मौसम का मिजाज भांपा गया है और उसके अनुरूप रणनीति बनाई गई है। कुछ प्रत्याशी ऐसे भी हैं, जो इन तात्कालिक टोटकों से अलग काफी पहले से अपनी अलग ही रणनीति पर चल रहे हैं और उनकी ‘दूरगामी इन्वेस्टमेंट’ वाली यह रणनीति काम करती भी दिख रही है। यह ‘बजरिये पंचायत’ भविष्य की स्थाई जमीन तैयार करने की कोशिश भी है।

समोसे, रसगुल्ले, जलेबी की आचारसंहिता
अमरोहा और संभल में पिछले दिनों जब एक प्रत्याशी के ‘खाते’ में 2 क्विंटल रसगुल्ला दर्ज हुआ तो लगा कि आखिर इसमें क्या गलत है और यह भी कि क्या कोई रसगुल्ला भी नहीं बंटवा सकता? इसे किसी घरेलू आयोजन से जोड़ने की कोशिश भी हुई। अलग बात है कि प्रत्याशी इसे साबित नहीं कर पाए और यह आचार संहिता उल्लंघन का मामला बना। पुलिस की नजर में आने के बाद जब सक्रियता बढ़ी तो ऐसे ही मामले तमाम और जगहों से भी निकल कर सामने आने लगे।

उन्नाव में दो क्विंटल जलेबी और 1100 समोसे पकड़े गए। प्रधान पद प्रत्याशी पर केस दर्ज हुआ। कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं। ऐसे में सहालग के नाम पर मिठाई और नमकीन के बड़े आर्डर लेने वाले दुकानदारों की भी फजीहत शुरू हो गई है। पुलिस गाहे-बगाहे इलाके के मिठाई वालों के यहां धमक जा रही है और ‘इलाके की टोह’ तो ले ही रही, नाश्ते-पानी का भी इंतजाम हो जा रहा है। मुसीबत ये है कि ऐसे मामले सामने आने पर मिठाई-नमकीन बनाने का सामान ही नहीं चूल्हा-भट्ठी भी जब्त हो जा रही है, जिसे लेकर मिठाई वालों में नाराजगी भी है।

10 अप्रैल को उन्नाव में पुलिस ने छापेमारी कर मिठाई पकड़ी थी।

10 अप्रैल को उन्नाव में पुलिस ने छापेमारी कर मिठाई पकड़ी थी।

गाजियाबाद के लोनी में एक प्रत्याशी से जुड़ा 35 किलोग्राम जलेबी, डेढ़ सौ लीटर दूध और इतना ही मावा तो जब्त किया ही गया, सामान ढो रहे ई रिक्शा को भी जब्त कर लिया गया। अब गरीब रिक्शा वाला अलग ही परेशान है। अमरोहा और सम्भल में प्रधानी लड़ रहे प्रत्याशियों को ही क्रमश: एक क्विंटल और ढाई क्विंटल रसगुल्ले के साथ धरा गया है।

एक जांच पुलिस कर रही, दूसरी प्रत्याशी की टीम
मुरादाबाद के भोजपुर इलाके में मिठाई के 300 डिब्बे, आगरा में एक वैन से रसगुल्ला और खीर मोहन के करीब आधा-आधा किलो के 500 पैकेट बरामद किए गए। आगरा मामले का रोचक पहलू यह कि पकड़े जाने के बाद जब पड़ताल हुई और पैकेट तोले गए तो वे 400-400 ग्राम के निकले जबकि प्रत्याशी के लोगों ने बताया कि इन्हें तो आधा-आधा किलो का बनवाया गया था। अब इस मामले में एक जांच पुलिस कर रही है तो दूसरी जांच जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशी की टीम। इस इलाके में पेठा और लड्डू की कई खेप (करीब 500 किलो) भी बरामद हो चुकी हैं, सबकी सब किसी न किसी प्रत्याशी के आर्डर पर सप्लाई हो रही थीं। इसी तरह आगरा में पुलिस ने छह क्विंटल रसगुल्ला/छेना पकड़ा था।

आगरा पुलिस ने 6 अप्रैल को जब्त किया था 2 क्विंटल छेना/रसगुल्ला।

आगरा पुलिस ने 6 अप्रैल को जब्त किया था 2 क्विंटल छेना/रसगुल्ला।

बीवी को वापस लाओ, वोट लो

लेकिन, लखनऊ के रहीमाबाद इलाके का मामला थोड़ा अ‍लग है। यहां प्रत्याशी नहीं, वोटर लाइम लाइट में है और खबर बना हुआ है। रहीमाबाद इलाके के रामनगर में एक वोटर ने प्रत्याशियों के सामने एक बड़ी चुनौती पूर्ण शर्त रख दी है। वोटर ने शर्त रखी है कि जो प्रत्याशी 6 माह पहले उससे रूठ कर मायके चली गई उसकी पत्नी को वापस ला देगा उसका वोट उसी को मिलेगा। मुश्किल है कि इस वोटर के समर्थन में उसके आसपास के काफी वोटर भी खड़े हैं, इसलिए प्रत्याशी आसानी से उसे नजरअंदाज भी नहीं कर पा रहे।

गेहूं में लगी आग और गिटार वाले उम्मीदवार
लेकिन पूर्वांचल और उसमें भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इलाके गोरखपुर और आसपास का रंग थोड़ा अलग है। ऐसा नहीं कि यहां मिठाई नहीं आ रही, दारू-पैसा नहीं चल रहा। लेकिन कुछ रंग हैं जो अलग से दिख जाते हैं।

चरगावां इलाके में एक प्रत्याशी ने पर्चे बांटकर वादा किया है कि ‘हम आपके गेहूं में लगी आग बुझाने आ रहे हैं…’. गिटार चुनाव निशान वाले प्रत्याशी के समर्थक जब इलाके में घूमते हैं तो आगे-आगे एक व्यक्ति गिटार लेकर चलता है और उसके पीछे आग बुझाने वाली टीम चलती है। बता दें कि इस मौसम में खेतों में आग बड़ी समस्या है और इस प्रत्याशी ने लोगों की यही नब्ज पकड़ी है जो काम करता दिखाई दे रहा है।

प्रत्याशी के पीछे गिटार लेकर चलता समर्थक।

प्रत्याशी के पीछे गिटार लेकर चलता समर्थक।

वोटों की एडवांस बुकिंग यानी लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट
खजनी इलाके के एक प्रत्याशी ऐसे भी हैं जो दीर्घावधि योजना पर भरोसा करते हैं और बिलकुल अलग ही नजीर पेश कर रखी है। खुलकर बोलते तो नहीं लेकिन सच यही है कि ये बीते दो-तीन साल से इलाके में ठीक उसी तरह सक्रिय होकर काम कर रहे हैं जैसा आज की भाजपा के बारे में कहा जाता है कि वो एक चुनाव खत्म होने से अगले चुनाव की शुरूआत तक हमेशा ‘चुनावी मोड’ में ही रहती है। इस प्रत्याशी ने दो साल पहले कम्बाइन मशीन (खेतों से फसल काटने वाली मशीन जिसके बाद खेतों में बची ठूंठ/डंठल जलाने की नौबत नहीं आती) खरीदी है और इनका वादा है कि ये किसी की भी फसल फ्री में काटेंगे और ऐसा कर भी रहे हैं। लोग इनकी इस पहल से खुश भी हैं। उन्हें बिना खर्च के काम होता दिख रहा है, जो उनकी बड़ी समस्या थी।

इतना ही नहीं ये प्रत्याशी एक गांव की हर शादी में प्रति घर 10 हजार रुपए और किसी का निधन होने पर उस परिवार को 5 हजार रुपए का सहयोग बिना किसी भेदभाव के देते हैं। जाहिर है उनके लिए यह दीर्घावधि इन्वेस्टमेंट है और सीधे-सीधे लाभ का मामला। गांव की गणित के हिसाब से भी देखा जाए तो एक गांव में एक साल की दोनों फसल काटने पर डीजल का खर्च एक लाख से ज्यादा का तो नहीं ही आएगा और मरनी-करनी के खाते में भी अधिकतम दस-दस मामले भी ले लिए जाएं तो दो साल में डीजल का खर्च 2 लाख और मरनी-करनी पर अधिकतम 3 लाख का खर्च आएगा। अब ऐसे वक्त में जब गांव का चुनाव भी 15 से 20 लाख की बात करता हो, यह इन्वेस्टमेंट तो हर नजरिए से फायदे का ही हुआ न।

 

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