महाराणा प्रताप पुण्यतिथि आज:प्रताप के प्रबंधन आज भी हैं आदर्श, सैनिकों को पिता जैसा स्नेह देते, जल प्रबंधन ऐसा कि मेवाड़ में अकाल पड़ने के बाद भी भूखे मरने की नौबत नहीं

मेवाड़ में तिथि अनुसार महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि आज मनाई जाएगी। - Dainik Bhaskar

मेवाड़ में तिथि अनुसार महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि आज मनाई जाएगी।

महाराणा प्रताप ने माघ शुक्ल एकादशी विक्रम संवत 1653 को अंतिम सांस ली थी। मेवाड़ में तिथि अनुसार महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि आज मनाई जाएगी। ऐसे में भास्कर अपने पाठकों को महाराणा के उन छह प्रबंधनों के बारे में बता रहा है, जो आज के समय में भी आदर्श हैं।

प्रताप ने मेवाड़ को मजबूत करने के लिए अर्थ के साथ खान प्रबंधन का खासा ध्यान रखा। अर्थ के लिए मंडिया लगाई तो शस्त्रागार भी बनवाए। आने वाली पीढ़ियों के लिए साहित्य को भी बढ़ावा दिया। भछापामार युद्ध की नीति बनाई तो कृषि और आपदा प्रबंधन से निपटने के लिए भूमिगत स्रोतों को भी बढ़ावा दिया। मंदिर और शिवालय बनाकर जनता में आस्था और विश्वास का संचार किया।

मकड़व्यूह

मकड़व्यूह

साहित्य : पंडित चक्रपाणि का ज्योतिषशास्त्र मुहूर्त माला हो या विश्वल्लभ प्रताप के काल में युद्ध शैली के अलावा साहित्य भी खूब विकसित हुआ। इस काल की पुस्तक राज्याभिषेक पद्धति भी प्रसिद्ध रचना है। प्रताप कालीन चित्रकार निसारदी की ‘रागमाला’ की चांवड शैली (कलम) भी विख्यात हुई। लोकभाषा के क्षेत्र में डिंगल साहित्य का विकास अहम है।

कृषि और आपदा प्रबंधन : आपदा प्रबंधन की तारीफ करते हुए अकबर के दरबारी साहित्यकार अबुल फजल ने लिखा था कि मेवाड़ ने अकाल का सामना किया, लेकिन भूखमरी के हालात नहीं बने। भूमिगत जल स्त्रोत, कुएं, तालाब और बावड़ी के निर्माण की वास्तु शास्त्रीय विधि आदि विकसित हुई। विश्ववल्लभ में मिट्टी के विभिन्न परीक्षण, ऋतुओं के अनुसार सिंचाई का ज्ञान आदि की भी जानकारी मिलती है।

सैन्य प्रबंधन और युद्ध कौशल : हल्दीघाटी युद्ध के बाद गोगुंदा में मुगल सेना को लगभग तीन माह तक मकड़ व्यूह में पकड़कर रखा गया। जब अकबर की सेना का गोगुंदा में डेरा था तब मेवाड़ की सेना पूरे क्षेत्र को घेरे हुए थी। मुगल सेना के लिए रसद रसद के सारे रास्ते भी बंद कर दिए थे। इसके अलावा प्रताप ने सेना के उपचार के लिए कालड़ा में चिकित्सा इकाई लगाई।

सर्पव्यूह

सर्पव्यूह

खान प्रबंधन : अबुल फजल ने अाईने अकबरी में लिखा- अकबर मांडलगढ़ और जावर माइंस को हथियाने की मंश रखता था। उसने जब मांडलगढ़ पर अधिकार किया तो जावर को बचाने के लिए प्रताप ने चावंड को राजधानी बनाकर आस-पास बलूआ, उदय की पहाड़ियाें और जावर के क्षेत्र में शस्त्रागार बनाकर सुरक्षित किया। अंत तक अकबर इस पर अधिकार नहीं कर पाया।

धार्मिक स्थल : प्रताप ने कई मंदिर बनवाए। जिसमें बलुआ स्थित चामुंडा मंदिर(सराड़ा), हरिहर मंदिर (झाड़ोल), सूंधामाता स्थित महादेव मंदिर (सिरोही), खरसाण में चारभुजा मंदिर और ईडर का शिवालय शामिल है।

अर्थ प्रबंधन: यहां अश्वपालन और गजपालन के चलते घोड़ो की मंडिया भी लगती थी। इतिहासकारों के मुताबिक चेतक भी अरबी नस्ल का घोड़ा था। कुंभा कालीन सिक्कों के साथ वस्तु विनियम यानी वस्तुओं के लेन-देन को चलन में लाया गया।

{इतिहासकार प्रो. चंद्रशेखर शर्मा की किताब राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप और युगंधर प्रताप, लोक संस्कृति और इतिहास के जानकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू की किताब चक्रपाणि मिश्र और उसके साहित्य के अनुसार।

 

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