मध्यप्रदेश में ‘जानलेवा’ लिफ्ट:सिर्फ लोड और अर्थिंग जांच करके देते हैं परमिशन; हादसा होने पर जिम्मेदारी भी तय नहीं

 

मध्यप्रदेश में लिफ्ट एक्ट नहीं होने से हादसे के लिए जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हो पाती। - Dainik Bhaskar

मध्यप्रदेश में लिफ्ट एक्ट नहीं होने से हादसे के लिए जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हो पाती।

  • लिफ्ट एक्ट नहीं होने से दोषियों पर नहीं हो पाती कार्रवाई
  • लोगों को यह तक पता नहीं कि किससे करें शिकायत
  • पिछले 24 घंटों में इंदौर, भोपाल समेत 3 जगह लिफ्ट से हादसे के मामले सामने आए

मध्यप्रदेश में बीते 24 घंटों के दौरान भोपाल और इंदौर समेत तीन जगह लिफ्ट गिरने के हादसे हुए। इंदौर में जहां पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ हादसे में बाल-बाल बचे, वहीं भोपाल में रविवार देर शाम लिफ्ट गिरने से 2 बच्चों समेत 7 लोग घायल हो गए। इनमें से 4 को गंभीर चोट आने के बाद भर्ती तक करना पड़ा।

लिफ्ट में सुरक्षा के इंतजाम तो छोड़ो, इमरजेंसी के लिए नंबर तक नहीं था। मध्यप्रदेश में लिफ्ट गिरने के लगातार हादसे हो रहे हैं, लेकिन किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती, क्योंकि लिफ्ट व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए एक्ट ही नहीं है। सवाल यह है, आखिर खानापूर्ति के लिए कब तक सिर्फ लोड और अर्थिंग की जांच करके अनुमति पत्र जारी कर हादसों को न्यौता दिया जाता रहेगा।

मध्यप्रदेश में 79 साल पुराना ब्रिटिशकालीन मुंबई लिफ्ट एक्ट चल रहा

मप्र में 79 साल पुराने ब्रिटिशकालीन मुंबई लिफ्ट एक्ट 1939 का इस्तेमाल किया जा रहा। इसी के तहत मध्यप्रदेश में वर्तमान में सतपुड़ा भवन मुख्य सतर्कता अधिकारी लिफ्ट लगने के बाद उसका लोड और अर्थिंग चैक करके अनुमति पत्र जारी कर देते हैं। हालांकि इस अनुमति पत्र का मतलब यह नहीं कि लिफ्ट सुरक्षा के सभी मापदंड पर लगाई है। यह सिर्फ लिफ्ट के लिए लाइसेंस जारी करने तक सीमित है। इसमें एक्सलेटर का तो जिक्र ही नहीं किया गया है। अगर हादसा होता है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा?

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विद्युत निरीक्षणालय है प्रदेश में लाइसेंसिंग अथॉरिटी

जानकारी के अनुसार लिफ्ट इलेक्ट्रो-मैकेनिकल डिवाइस है, इसलिए इसके इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल दोनों पार्ट की भी जांच होनी चाहिए। प्रदेश में लिफ्ट लगाने के लिए लाइसेंसिंग अथॉरिटी मप्र विद्युत निरीक्षणालय (चीफ इलेक्ट्रिक इंस्पेक्टर) है।

टेक्नोलीगल जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाली यह संस्था प्रदेश में 6 कानूनों का पालन कराती है। लिफ्ट लगाने के आवेदन पर इसके द्वारा सिर्फ विद्युत मोटर, विद्युत कनेक्शन और अर्थिंग सिस्टम की प्रारंभिक जांच की जाती है।

लिफ्ट के मैकेनिकल पार्ट की जांच इस संस्था द्वारा नहीं की जाती है, क्योंकि संस्था के पास मैकेनिकल पार्ट की जांच के न तो एक्सपर्ट हैं, न ही मैकेनिकल नियमों के तहत कोई अधिकार। इसकी भी जांच नहीं होती है कि शहर में कितनी लिफ्ट लगी हैं और वे किसकी अनुमति से लगाई गई हैं।

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लिफ्ट में हादसा होने पर जिम्मेदार कौन, तय नहीं

एक्ट न बन पाने की वजह : एक्ट को लेकर कभी सोचा ही नहीं गया। यह भी तय नहीं है कि यह किस विभाग के अंतर्गत रखा जाए। मप्र में लिफ्ट एक्ट बनाने को लेकर पीआईएल भी दायर की गई है, लेकिन कुछ नहीं हुआ। लिफ्ट को लेकर कोई भी स्पष्ट कानून या नियम-शर्तें नहीं हैं। हादसा होने पर किसी की कोई जिम्मेदारी तय नहीं। पीड़ित कहीं कोई शिकायत नहीं कर पाता है। बगैर अनुमति लिफ्ट लगाने पर सजा का प्रावधान नहीं।

12 से ज्यादा राज्यों में एक्ट है

ओडिशा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, मुंबई, असम, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु व कर्नाटक के बाद झारखंड में भी लिफ्ट एक्ट वर्ष 2017 में बना दिया गया। इसमें लिफ्ट में किसी भी दुर्घटना की वजह से मौत या क्षति होने पर मालिक को 24 घंटों के अंदर दुर्घटना का ब्यौरा संबंधित पदाधिकारी को देना होता है। दुर्घटना के लिए लिफ्ट लगाने या रख-रखाव करने वाली कंपनी जिम्मेदार होती है। एक्ट का उल्लंघन करने पर तीन माह की सजा और 50 हजार रुपए के जुर्माना तक तय है।

लिफ्ट एक्ट बनने से फायदा

लिफ्ट और एस्कलेटर आदि की सुरक्षा को लेकर अलग से स्पष्ट नियम बन जाने से रख-रखाव और अधिकारियों तक की पूरी जिम्मेदारी तय होगी। लिफ्ट में खामी मिलने की शिकायत की जा सकेगी। जिम्मेदारी तय होने से पीड़ित को भी क्षतिपूर्ति पाने का हक मिलेगा।

 

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