मंदिर में जाते है नंगे पाँव, जानिए क्या है कारण

मंदिर के बाहर जूते और चप्पल उतारने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। व्यक्ति हमेशा सभ्य समाज की कल्पना को ध्यान में रखते हुए कर्मकांड करने के भी कुछ नियम बनाये गये है। इनमे से एक बुनयादी चीज़ है, मंदिर में बिना जूते और चप्पल के प्रवेश करना। हम सभी बचपन से ऐसा करते भी आये है। आज आपको ऐसे ही कुछ तथ्य के बारे में बताने जा रहे है। जो इस कर्म के पीछे के आधार है।
मंदिर में जूते और चप्पलों को उतरने का कारण:
# नकारात्मक ऊर्ज़ा से मुक्ति: जूते और चप्पलों में रज और तम धातुओं की प्रधानता होती है यह धातु पाताल (नरक) से आने वाली नकारात्मक ऊर्ज़ा को अपने अंदर समा लेते है। मंदिर के चारों तरफ ईश्वरीय प्रभाव से सात्विक और चैतन्य वातावरण बना हुआ होता है। ऐसे माहौल में जूते और चप्पल पहनकर जाने से पाताल से आने वाली नकारात्मक ऊर्ज़ा इनके माध्यम से आकर यहाँ के माहौल को दूषित कर देंगी।
# गंदगी से बचाव: जूते और चप्पल मंदिर प्रांगण में ले जाने से चारों तरफ गंदगी फ़ैल जाएगी।
# अमीर-गरीब का फर्क: जब कोई जूते और चप्पल पहने हुए होता है तो उस समय उस व्यक्ति का मानसिक स्तर में एक विशेष प्रकार का एटीट्यूड होता है। मंदिर के अंदर अमीर-गरीब के फर्क को मिटाने के लिए इस प्रथा को बनाया गया है।
# मंदिर की शीतलता: मन्दिर का वातावरण शीतल होता है जिससे मन भी शीतल बना रहता है जब हम नंगे पांव मन्दिर प्रांगण में जाते है तो उस ठंडक को पैरों के माध्यम से पूरे शरीर में महसूस कर सकते हैं। इससे तन और मन दोनों में शीतलता आती है।

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