भेदभाव मिटाने का आग्रह:कोर्ट ने कहा-वेदों में भी समानता के सिद्धांत की बात, आदेश-युवती की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो व सुरक्षा दे सरकार

 

भेदभाव मिटाने का आग्रह - Dainik Bhaskar

भेदभाव मिटाने का आग्रह

  • युवती बाेली-जातिगत भेदभाव के कारण शादी नहीं हाेने दे रहे परिजन
  • हाईकोर्ट ने कहा-अंतरजातीय विवाह का विरोध करना अज्ञानता, ऐसे लोगों को भगवान का आशीर्वाद नहीं
  • सती-शिव, रुक्मणि-कृष्ण, दुष्यंत-शकुंतला के उदाहरण

जातिवाद के कारण अंतरजातीय विवाह का विरोध करना आध्यात्मिक एवं धार्मिक अज्ञानता का नतीजा है। स्वतंत्र विचार भारतीय परंपराओं का मौलिक रूप है। कुछ लोग धर्म के नाम पर जातिवाद और इसके आधार पर भेदभाव को जारी रखना चाहते हैं, परंतु वे अज्ञानतावश ऐसा करते हैं, क्योंकि ऐसी सोच धर्म के आधार व सच्चे सार के विरुद्ध है।

ये टिप्पणी प्रदेश हाईकोर्ट ने जातिगत भेदभाव के कारण अपने ही परिजनों द्वारा युवती को बंधक बनाए जाने के आरोपों को लेकर दायर याचिका का निपटारा करते हुए की। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने सरकार को आदेश दिए कि वह युवती की स्वतंत्रता सुनिश्चित करे व उसे वांछित सुरक्षा प्रदान करें।

याचिकाकर्ता युवक का आरोप था कि वह जिस युवती के साथ शादी करना चाहता है उसे उसके परिजनों ने बंधक बना दिया है। बंधक बनाने की वजह जातिगत भेदभाव बताते हुए प्रार्थी ने लड़की की स्वतंत्रता बहाल करने हेतु हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट में पेश युवती ने हाईकोर्ट को बताया कि जातिगत भेदभाव के चलते उसके परिजन नहीं चाहते कि वह याचिकाकर्ता से विवाह करें।

भगवद गीता का उल्लेख किया, कहा-जाति आधारित भेदभाव संविधान व सत्य धर्म के विरुद्ध

कोर्ट ने भगवद गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि गीता में भी यह कहा गया है कि जो मनुष्य भगवान के बनाए प्राणियों में भेदभाव करता है अथवा हर जगह भगवान की उपस्थिति को नहीं देखता है, उसे कभी आत्मबोध व भगवान का आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता। धार्मिक मूल्यों के मूल स्रोत वेदों को भुलाकर कभी कभी जातिगत भेदभाव को प्रतिपादित किया जाता है।

इसलिए वेदों में बताए मूल्यों व सिद्धान्तों के विरुद्ध कहीं भी जो कुछ जातिगत भेदभाव के बारे में लिखा गया है, उसे दरकिनार कर देना चाहिए चाहे वह पुराणों, स्मृतियों अथवा अन्य धर्मग्रंथों में ही क्यों न कहा गया हो। वेदों में बिना किसी भेदभाव के समानता के सिद्धांत को आधार बनाकर साथ खाने, इकठ्ठे रहने, साथ आगे बढ़ने व मिलकर काम करने की बात कही गई है। इसलिए जाति आधारित भेदभाव न केवल संविधान के विरुद्ध है बल्कि सत्य धर्म के विरुद्ध भी है।

इतिहास को छोड़कर भी देखा जाए तो समाज में संविधान को मानना जरूरी
न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने फैसले के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि ये सभी धर्मों का आध्यात्मिक आधार व धार्मिक संदेश है कि भगवान हर जगह व हर प्राणी में हैै इसलिए जाति, लिंग, रंग, पंथ, वर्ग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। कोर्ट ने कहा-यदि इतिहास व पुरातन मूल्यों को किनारे भी रखा जाए तो भी आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वह संविधान से संचालित है और यहां हर हालत में कानून का राज स्थापित होना है।

जीवन साथी को चुनने का हक हमारे भारतीय समाज में पुरातन काल से

कोर्ट ने कहा कि शादी करना, किसी जायज कारण से शादी न करना और शादी के लिए अपनी इच्छा से साथी चुनने का अधिकार हमारे भारतीय समाज मंे पुरातन काल से है। परन्तु मध्यकाल की बुराइयों के चलते गलत धारणाएं उत्पन्न हो गई जो हमारी सभ्यता व परम्पराओं के उच्च मूल्यों व सिद्धान्तों पर हावी हो गई।

सत्यवती-शांतनु और दुष्यंत-शकुंतला अंतरजातीय विवाह के जाने माने उदाहरण रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि सती ने अपने पिता राजा दक्षप्रजापति की इच्छा के विरुद्ध जाकर भगवान शिव से विवाह रचाया। 5 हजार वर्षों से पुराने भगवान कृष्ण व रुक्मणि के विवाह का उल्लेख कर कोर्ट ने कहा कि रुक्मणि का भाई उसकी शादी शिशुपाल से करवाना चाहता था जबकि रुक्मणि भगवान कृष्ण से शादी करना चाहती थी। इसलिए रुक्मणि ने भगवान कृष्ण को पत्र लिख कर उसे ले जाने व उसे अपनी पत्नी बनाने को कहा। कृष्ण ने रुक्मणि को मंडप से उठा लिया था व विवाह किया। ऐसा ही उदाहरण अर्जुन व सुभद्रा का है।

 

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