भारत में इन सर्वोच्‍च पदों पर आज तक किसी महिला की नियुक्ति नहीं हुई

समय बदल रहा है. पितृसत्‍ता सवालों के घेरे में है. अब हर क्षेत्र में डिस्‍कोर्स इस बात का है कि स्‍त्री-पुरुष के बीच बराबरी कैसे हासिल की जाए. जहां-जहां जेंडर गैप दिखाई देता है, उस गैप को कैसे कम और खत्‍म किया जाए. महिलाओं को जहां भी मौका मिल रहा है, वहां वह अपनी काबिलियत साबित भी कर रही हैं. जब भारत का संविधान बना तो स्‍पष्‍ट शब्‍दों में यह कहा गया कि इस देश में जाति, धर्म, लिंग किसी भी आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा. संविधान और कानून की नजर में दोनों जेंडर यानी स्‍त्री और पुरुष बराबर हैं. उनके हक और अधिकार बराबर हैं.

संविधान में बराबरी की वैचारिक और भावनात्‍मक बुनियाद तो रख दी गई, लेकिन आज तक भी यह बराबरी मुमकिन नहीं हो पाई है. हम काम से लेकर संपत्ति के बंटवारे तक में बराबरी हासिल नहीं कर पाए हैं. हालांकि नौकरियों में महिलाओं की हिस्‍सेदारी बढ़ी है और उन क्षेत्रों में दखल भी, जहां अब तक सिर्फ पुरुषों का दबदबा था. फिर भी ऐसे बहुत से पद और मुकाम ऐसे हैं, जहां आज तक कोई महिला नहीं पहुंच पाई.

आइए आपको बताते हैं उनमें से कुछ ऐसे सर्वोच्‍च पदों के बारे में, जहां पहुंचने वाली महिला के लिए कहा जाएगा कि ये उपलब्धि हासिल करने वाली वह भारत की पहली महिला हैं.

Supreme Court

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (भारत की मुख्‍य न्‍यायाधीश)

भारत की आजादी के बाद 1950 से लेकर अब तक कुल 47 चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रह चुके हैं. 1950 में हरिलाल जेकिसुनदास काणिया से लेकर 18 नवंबर, 2019 को भारत के 47वें चीफ जस्टिस बने शरद अरविंद बोबडे तक सभी पुरुष रहे हैं. इस पद पर अब तक कोई महिला नहीं पहुंची है. हालांकि आजादी को 73 साल हो चुके हैं और अब तक सुप्रीम कोर्ट की जज भी सिर्फ 8 महिलाएं हुई हैं. इसी महीने जस्टिस इंदु मल्‍होत्रा के रिटायरमेंट के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ एक महिला जज रह गईं हैं- इंदिरा बनर्जी.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट से लेकर जजों के कोलेजियम तक में जिस तरह मर्दों की मोनोपॉली है, उसे देखकर ऐसा लगता तो नहीं कि निकट भविष्‍य में हम भारत के सर्वोच्‍च न्‍यायालय की सर्वोच्‍च कुर्सी पर किसी महिला को बैठे हुए देख पाएंगे, लेकिन फिर भी यह उम्‍मीद नहीं छोड़नी चाहिए. इतिहास गवाह है, जहां भी महिलाएं पहुंची हैं, आखिरकार मर्दों के तमाम विरोधों और अटकलों के बावजूद पहुंची हैं.

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भारतीय सेना की पहली महिला प्रमुख

भारत की आजादी के बाद से लेकर अब तक कुल 29 सेना प्रमुख हो चुके हैं और वो सब के सब पुरुष हैं. आजादी के बाद 21 जून, 1948 को सर फ्रांसिस रॉबर्ट भारतीय सेना के प्रमुख बने. वो एक ब्रिटिश सिपाही, भारतीय सेना के सेकेंड कमांडर इन चीफ और आजादी व भारत के विभाजन के बाद भारतीय सेना का सर्वोच्‍च पद संभालने वाले आखिरी गैरभारतीय व्‍यक्ति थे. उसके बाद 1949 में एम. करियप्‍पा भारतीय सेना प्रमुख बनने वाले पहले भारतीय व्‍यक्ति थे. एम. करियप्‍पा से लेकर 2019 में सेना प्रमुख बने जनरल एम. एम. नरवाने तक सभी सेना प्रमुख पुरुष हैं.

लेकिन उसकी एक वजह और भी है. आजादी के पहले और उसके बाद भी लंबे समय तक सेना में महिलाओं का प्रवेश वर्जित था. 1992 में ये हुआ कि भारतीय सेना ने अपने दरवाजे मेडिकल कॉर्प्‍स के अलावा सेना की अन्‍य ईकाइयों के लिए भी खोले. 2008 में पहली बार उन्‍हें लीगल और एजूकेशन कॉर्प्‍स में स्‍थाई कमीशन दिया गया. लेकिन सबसे महत्‍वपूर्ण ईकाइयों में महिलाओं को स्‍थाई कमीशन तो 2020 में जाकर मिला. वो भी सुप्रीम कोर्ट में 16 साल लंबी लड़ाई के बाद. अब तक सेना में महिलाओं की हिस्‍सेदारी 3 फीसदी से ज्‍यादा नहीं है, जबकि इंडियन एयर फोर्स में महिलाओं की हिस्‍सेदारी 13.9 और इंडियन नेवी में 6 फीसदी है.

भारतीय सेना के प्रमुख पद पर किसी महिला का बैठना अभी भी दूर की कौड़ी ही लगती है, लेकिन जब भी ये होगा, वो दिन इतिहास में दर्ज होगा.

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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की पहली महिला गवर्नर

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारत सरकार का सेंट्रल बैंक और रेगुलेटरी बॉडी है. आज से 85 साल पहले 1 अप्रैल, 1935 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की स्‍थापना हुई थी. आरबीआई भारत सरकार के वित्‍त मंत्रालय के अंतर्गत आता है और इस वक्‍त 1980 बैच के रिटायर्ड आईएएस शक्तिकांत दास आरबीआई के गवर्नर हैं. आजादी के बाद 1949 में बेनेगल रामाराव रिजर्व बैंक के पहले गवर्नर बने. उसके बाद से लेकर अब तक कुल 22 लोग आरबीआई के गवर्नर रह चुके हैं, लेकिन उनमें से कोई भी महिला नहीं है.

हालांकि डिप्‍टी आरबीआई गवर्नर महिलाएं हो चुकी हैं. वर्ष 2003 में के.जे. उडेशी को आरबीआई का डिप्‍टी गवर्नर नियुक्‍त किया. वो इस पद तक पहुंचने वाली पहली महिला थीं. उसके बाद 2005 में उषा थोराट और श्‍यामला गोपीनाथ भी डिप्‍टी गर्वनर बनीं. लेकिन अभी तक सरकार ने किसी महिला को गवर्नर के पद पर नियुक्‍त नहीं किया है.

आरबीआई के गवर्नर आईएएस अधिकारी होते हैं और सिविल सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी न सिर्फ लगातार बढ़ रही है, बल्कि उन्‍होंने बहुत दूरगामी असर डालने वाला काम भी किया है. इसलिए हमें इंतजार है कि जल्‍द ही सरकार किसी महिला को आरबीआई का गवर्नर बनाकर उसे इस पद पर बैठने वाली पहली महिला होने का गौरव प्रदान करे.

सिक्‍योरिटीज एंड एक्‍सचेंज बोर्ड (सेबी) की पहली महिला चेरयमैन

भारत में 1988 में सेबी (सिक्‍योरिटीज एंड एक्‍सचेंज बोर्ड) की स्‍थापना हुई. स्‍टॉक मार्केट और म्‍यूचुअल फंड समेत जनता के पैसों का निवेश करने वाली सभी संस्‍थाओं को रेगुलेट करने की जिम्‍मेदारी सेबी के कंधों पर है. 1988 से लेकर अब तक सेबी के कुल 9 चेयरमैन रह चुके हैं और इनमें से कोई भी महिला नहीं है. डॉ. एस.ए. दवे सेबी के पहले चेयरमैन थे और इस वक्‍त अजय त्‍यागी यह पद संभाल रहे हैं.

सेबी के चेयरमैन की नियुक्ति भारत सरकार करती है. इसके अलावा भारत सरकार के वित्‍त मंत्रालय के दो अधिकारी सेबी की प्रबंध समिति में होते हैं और एक सदस्‍य रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का होता है. चेयरमैन की नियुक्ति का सर्वाधिकार भारत सरकार के पास सुरक्षित है.

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इंडियन स्‍पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) की पहली महिला चेरयमैन

1962 में इंडियन स्‍पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन यानी इसरो की स्‍थापना हुई और विक्रम साराभाई उसके पहले चेरयमैन बने. उसके बाद से लेकर अब तक कुल 10 लोग इसरो प्रमुख का गौरवशाली पद संभाल चुके हैं, लेकिन आज तक कोई महिला इसरो की चेयरमैन नहीं बनी.

2014 में जब मंगल मिशन सफलतापूर्वक पूरा हुआ तो सारा मीडिया और अखबार उन महिलाओं की गौरव गाथाओं से भरा हुआ था, जिन्‍होंने इस मंगल मिशन को पूरा करने में सिर्फ महत्‍वपूर्ण नहीं, बल्कि क्रिटिकल भूमिका निभाई थी. उस संस्‍था को आगे बढ़ाने और विज्ञान के क्षेत्र में भारत का नाम रौशन करने में इसरो की महिला वैज्ञानिकों का योगदान बहुत बड़ा है, लेकिन जब इसरो का सबसे ऊंचा पद संभालने की बात आती है तो महिलाओं का नाम कभी आगे नहीं आता. इसरो में 25 फीसदी वैज्ञानिक महिलाएं हैं, लेकिन ये अनायास नहीं कि आज तक कोई महिला चेयरमैन नहीं हुई.

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सीबीआई (सेंट्रल इंवेस्टिगेशन ब्‍यूरो) की पहली महिला प्रमुख

सीबीआई भारत की सबसे बड़ी जांच एजेंसी है, जिसकी स्‍थापना 1942 में एक विशेष पुलिस फोर्स के रूप में हुई थी. अब तक कुल 31 लोग सीबीआई प्रमुख के पद पर रह चुके हैं और वो सब-के-सब पुरुष हैं. सीबीआई प्रमुख मुख्‍यत: डायरेक्‍टर जनरल ऑफ पुलिस स्‍तर का आईपीएस अधिकारी होता है और डायरेक्‍टर की नियुक्ति हाई प्रोफाइल कमेटी के द्वारा की जाती है. दिल्‍ली स्‍पेशल पुलिस एस्‍टैबलिशमेंट एक्‍ट, 1946 के प्रावधानों के तहत इस कमेटी का गठन होता है.

आईपीएस में महिलाओं की भागीदारी भी समय के साथ बढ़ी है. वर्ष 2007 में किरण बेदी भारत की पहली महिला डायरेक्‍टर जनरल ऑफ पुलिस बनीं, लेकिन उन्‍हें भी सीबीआई तक पहुंचने का मौका नहीं मिला. ऐसा नहीं है कि योग्‍य महिलाएं नहीं हैं, लेकिन उन्‍हें बराबरी का मौका देने के लिए समाज और मर्द, दोनों की मानसिकता को बदलने की जरूरत है.

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आईबी (इंटेलीजेंस ब्‍यूरो) की पहली महिला प्रमुख

आईबी भारत की घरेलू इंटेलीजेंस एजेंसी है. यह दुनिया की सबसे पुरानी इंटेलीजेंस एजेंसियों में से एक है, जिसकी स्‍थापना 1887 में हुई थी. आजादी के बाद 1947 में टी.जी. संजीवी पिल्‍लई आईबी के पहले डायरेक्‍टर बने थे. उसके बाद से लेकर अब तक कुल 27 लोग आईबी के डायरेक्‍टर रह चुके हैं, लेकिन उनमें से कोई भी महिला नहीं है.

रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) की पहली महिला प्रमुख

भारत की फॉरेन इंटेलीजेंस एजेंसी रॉ की स्‍थापना आज से 52 साल पहले 21 सितंबर, 1968 को हुई थी. इस एजेंसी का प्रमुख काम फॉरेन इंटेलीजेंस से जुड़ी जानकारियां जुटाना, आतंकवाद को रोकना और देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए काम करना है. 1968 में आर. एन. काओ रॉ के पहले प्रमुख बने. उसके बाद से लेकर अब तक कुल 23 लोग रॉ प्रमुख रह चुके हैं, लेकिन उनमें से कोई भी महिला नहीं है. हालांकि बतौर स्‍पाय कई महिलाओं ने रॉ के काम में महत्‍वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन हमें अभी भी उस दिन का इंतजार है, जब कोई महिला इस बेहद अहम संस्‍थान की सबसे ऊंची कुर्सी पर विराजमान होगी.

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