बकस्वाहा जंगल को बचाओ

 

हीरे की खदान vs ढाई लाख पेड़

विशेष रिपोर्ट-

मध्य प्रदेश के बकस्वाहा जंगल को बचाने के लिए सोशल मीडिया में लोग अलग अलग तरीको से मुहिम चला रहे है।
चार सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैले बकस्वाहा जंगल में जिस तरीके से सरकार लाखों की संख्या में पेड़ों को हीरा खदान के चक्कर में काटने की सरकार तैयारी में है जिसे नहीं रोका गया तो सरकार का कदम पर्यावरण के लिहाज से बहुत ही घातक होगा।क्योंकि इतनी जल्दी किसी भी रूप में इतने पेड़ पौधों का विस्तार नही हो सकता है।
मध्य प्रदेश के छतरपुर इलाके में बक्सवाहा जंगल के नीचे दबे करीब 50000 करोड़ के हीरा उत्खनन के लिए ढाई लाख से ज्यादा पेड़ों को काटे जाने के खिलाफ आन्दोलन शुरू हुुआ है। इस क्षेत्र में रहने वाले लोग वन्यप्राणियों और आम लोगों के हित को देखते हुए पेड़ काटे जाने का विरोध कर रहे हैं ।हीरा खनन के नाम पर बक्सवाहा के जंगल

उजाड़ने के खिलाफ़ टि्वटर पर #savebaxwahaforest ट्रेंड करने लगा है।
बताया जाता है की बक्सवाहा की ज़मीन के नीचे बेशकीमती ख़ज़ाना छुपा है जिसको हासिल करने के लिए राज्य सरकार ने एक निजी कंपनी को बक्सवाहा के जंगल 50 साल के लिए लीज पर दिया है।लेकिन इस ख़ज़ाने को हासिल करने के लिए ढाई लाख से ज़्यादा पेड काटे जाएंगे।बताया जाता है कि इस ज़मीन के नीचे पन्ना से 15 गुना ज्यादा हीरे गड़े है।और इन्हीं हीरो को हासिल करने के लिए 382.131 हेक्टेयर के जंगल को नष्ट किया जाएगा। जंगल नष्ट करने के लिए सरकार ने हामी भर दी है।लेकिन स्थानीयलोग अपने जंगलों को काटने दे को राज़ी नहीं है स्थानीय लोगों ने सरकार के खिलाफ़ मुहिम छेड़ दी है।सरकार ने 20 साल पहले छतरपुर के बक्सवाहा में बंदर प्रोजेक्ट के तहत सर्वे शुरू किया था। दो साल पहले मप्र सरकार ने इस जंगल की नीलामी की थी। जिसे आदित्य बिड़ला ग्रुल के एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड ने खनन के लिए खरीदा। हीरा भंडार वाली 62.64 हेक्टेयर ज़मीन को मध्यप्रदेश सरकार ने इस कंपनी को 50 साल के लिए लीज पर दिया है।लेकिन कंपनी ने 382.131 हेक्टेयर का जंगल मांगा है। कंपनी का तर्क है कि बाकी 205 हेक्टेयर जमीन का उपयोग खदानों से निकले मलबे को डंप करने में किया जाएगा।कंपनी इस प्रोजेक्ट में 2500 करोड़ रुपए का निवेश करने जा रही है।
जमीन से हीरा निकालने के लिए ढाई लाख से ज़्यादा पेड़ों को काटा जाएगा। इसके लिए वन विभाग ने गिनती भी कर ली है।जंगल में बेशकीमती सागौन, जामुन, हेड़ा, पीपल. तेंदु, महुआ समेत कई पेड़ हैं।बिड़ला से पहले ऑस्ट्रेलियाई कंपनी रियोटिंटो ने बक्सवाहा का जंगल लीज़ पर लिया था, लेकिन मई 2017 में संशोधित प्रस्ताव पर पर्यावरण मंत्रालय के अंतिम फैसले से पहले ही रियोटिटों ने यहां काम करने से इंकार कर दिया था। कंपनी ने उस दौर में बिना अनुमति 800 से ज्यादा पेड़ काट डाले थे।बताया जाता है कि बक्सवाहा के जंगलों की जमीन के नीचे 50 हज़ार करोड़ रुपए के हीरे हैं।

आरटीआई एक्टिविस्ट अजय दुबे कहते हैं कि “बुंदेलखंड में बक्सवाहा के जंगलों की जैव विविधता को नष्ट करने की जल्दबाजी आत्मघाती कदम है और इसे तत्काल रोकना चाहिए ।मध्यप्रदेश की तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने हीरों के लालच में बिड़ला समूह को न केवल लाखों पेड़ और वन्य प्राणियों की बर्बादी का रास्ता खोला बल्कि आम जनता के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई लाइन काटने निंदनीय कार्य किया है।केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट में लाखों पेड़ों के नष्ट होने के साथ पन्ना टाइगर रिजर्व का 40 फीसदी हिस्सा डूब जाएगा, जो भविष्य की पीढ़ियों के साथ विश्वासघात होगा’’।पेड़ कटने से नष्ट हो जाएगी जैव विविधता नष्ट हो जाएगी।लगातार इस मुद्दे को कवर कर रहे बक्सवाहा के पत्रकार राजू दुबे ने बताया कि जंगल में बेशकीमती पेड़ हैं, जानवर हैं यह क्षेत्र सघन वन से घिरा हुआ है। साथ ही यह क्षेत्र जैव विविधता से भी परिपूर्ण है।मई 2017 में पेश की गई जियोलॉजी एंड माइनिंग मप्र और रियोटिंटो कंपनी की रिपोर्ट में इस क्षेत्र में तेंदुआ, भालू, बारहसिंगा, हिरण, मोर सहित कई वन्य प्राणियों के यहां मौजूद होने की बात कही गई थी।इतना ही नहीं इस क्षेत्र में गिद्ध भी लुप्त हो रहे हैं।
लेकिन सरकार के दवाब के चलते प्रस्तुत की गई नई रिपोर्ट में डीएफओ और सीएफ छतरपुर ने यहां पर एक भी वन्य प्राणी के नहीं होने का दावा किया है।हीरे निकालने से इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में पेड़ काटे जा रहे हैं। वहीं यहां मौजूद वन्य प्राणियों के अस्तित्व पर भी संकट खड़ा हो जाएगा दिल्ली की समाजसेविका नेहा सिंह ने 9 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी याचिका में कहा गया है कि हीरों के लिए हम अपने जीनवदायी लाखों पेड़ों की बलि नहीं दे सकते हैं लाखों पेड़ों के कटने से पर्यावरण को अपूर्णीय क्षति होगी, हम एक भी पेड़ नहीं कटने देंगे।नेहा सिंह ने हीरा खनन के लिए आदित्य बिड़ला ग्रुप की दी गई लीज़ निरस्त करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि हीरा खनन हो, लेकिन उनके लिए हमारे जीवन के लिए ज़रूरी पेड़ ना काटे जाये।पेड़ काटने से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई संभव नहीं है।
याचिका में ये भी कहा गया है कि जिस क्षेत्र में खनन की अनुमति दी गई है वो न्यून जल क्षेत्र है, यहां पानी की कमी है।कंपनी के काम के लिए बड़ी मात्रा में इस इलाके से पानी का दोहन किया जाएगा, जिसके नतीजतन आसपास का जल स्तर प्रभावित होगा।लोगों को पानी की दिक्कत होगी, साथ ही वन्य प्राणी भी प्यासे मर जाएंगे।लिहाजा इस अनुबंध को निरस्त किया जाए।इंडियन काउसिंल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एज्युकेशन एक पेड़ की औसत उम्र 50 साल मानी गई है ICFRE के मुताबिक 50 साल में एक पेड़ 50 लाख कीमत की सुविधा देता है।और इन 50 सालो में एक पेड़ 23 लाख 68000 रुपए कीमत का वायु प्रदुषण कम करता है।अतः सरकार को पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस परियोजना को रोक देना चाहिए।

योगेंद्र गौतम
उन्नाव

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