बंधन से संन्यास:राहुल अब मुनि रत्नेश, चंदनबाला बनीं चेतस्वी, प्रज्ञा कहलाएंगी ओजस्वी प्रभा

प्रदेश में जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ का पहला दीक्षा महोत्सव रविवार को हुआ। जैनम मानस भवन में आयोजित भागवती दीक्षा में तीन मुमुक्षुओं ने घर-परिवार समेत तमाम सांसारिक बंधनों से संन्यास लेते हुए संयम जीवन अपना लिया। धर्मसंघ के 11वें आचार्य महाश्रमण ने इन्हें दीक्षा दी, फिर नया नाम देकर नई पहचान भी दी। गीदम के राहुल बुरड़ अब मुनि रत्नेश कुमार कहलाएंगे। वहीं ओडिशा की चंदनबाला अब साध्वी चेतस्वी प्रज्ञा और समणी ओजस्वी प्रज्ञा को ओजस्वी प्रभा के नाम से जाना जाएगा।

देशभर से राजधानी पहुंचे जैन समाज के हजारों लोग इस अद्भुत दीक्षा महोत्सव के साक्षी बने। समाज के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देने वाले नए साधु-साध्वियों का सभी ने बड़े ही उत्साह से स्वागत-वंदन किया। नवदीक्षित साधु-साध्वियों को संदेश देते हुए आचार्य महाश्रमण ने कहा, भारत नाना प्रकार के धर्म-संप्रदायों का देश है। सभी धर्म में अपने तरह की दीक्षा होती है। जैन धर्म में इसका आधार संयम है। संयम में रहने वालों का जीवन श्रेष्ठ होता है। आमतौर पर यह माना जाता है कि स्वर्ग सुखों से भरा है, पर सच ये है कि साधु जीवन में रम जाएं तो देवी-देवताओं से भी अधिक सुख की अनुभूति होती है। आचार्य ने कहा, अब दीक्षार्थियों को साधु जीवन जीना होगा। संयम, त्याग और समर्पण की भावना को अब अपने आचरण में उतारना होगा।

जब गुरुवर ने किया केशलोच…
जैन धर्म में अहिंसा का इतना अधिक महत्व है कि साधु-साध्वियां उस्तरे से अपने बाल तक नहीं बनवाते। इसकी जगह वे खुद ही अपने हाथों से ही अपने बाल निकालते हैं। दीक्षा लेने वाले राहुल का जहां आचार्य महाश्रमण ने केशलोच किया, तो साध्वी चेतस्वी प्रभा और समणी ओजस्वी प्रभा का केशलोच साध्वी कनकप्रभा ने किया। आचार्य ने कहा कि केशलोच दीक्षा की पहली कसौटी है। इस प्रक्रिया कष्टप्रद है पर असंभव नहीं। इससे सहिष्णुता का पता चलता है।

आचार्य ने बताया क्या है तेरापंथ, जानिए
आचार्य महाश्रमण ने बताया, जैन धर्म में श्वेतांबर एवं दिगंबर दो मुख्य धाराएं हैं। श्वेतांबर में भी मूर्तिपूजक-अमूर्तिपूजक विचारधारा है। तेरापंथ संघ मूर्ति पूजक विचारधारा को नहीं मानता है। यह अमूर्तिपूजक संघ है। आचार्य भिक्षु द्वारा प्रवर्तित यह तेरापंथ प्रभु का पंथ है। हे प्रभो! यह तेरापंथ। हम इस प्रभु के पथ के पथिक है। पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्तियों की आराधना भी तेरापंथ के साधुओं की पहचान है। हमारे यहां दीक्षाएं ऐसे ही नहीं होती। वहीं, साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा ने कहा कि दीक्षा रूपांतरण की प्रक्रिया है। अध्यात्म यात्रा व आत्म जागरण की ओर प्रस्थान है दीक्षा। जैन धर्म में प्राचीन काल से ही दीक्षा का क्रम चल रहा है। अनेक संप्रदाय हैं जिनमें हजारों साधु-साध्वियां साधना कर रहे हैं, लेकिन तेरापंथ की दीक्षा इसलिए अलग है क्योंकि तेरापंथ में आचार्य ही शिष्य को दीक्षित करते हैं। गुरु आज्ञा के बिना कोई भी किसी को दीक्षा नहीं दे सकता। आचार्य की आज्ञा ही शिष्य के जीवन का आधार होती है। आचार्य शिष्यों को आगे बढ़ाते हैं। दीक्षित साधु-साध्वियां अपना सर्वस्व गुरु चरणों में समर्पित कर एकलव्य की तरह अपनी साधना का विकास करें, संयम यात्रा में आगे बढ़े।

मां-बाप ने कहा- चार पुत्र भी होते तो समर्पित कर देते
गीदम के मुमुक्षु राहुल के सगे छोटे भाई ऋषि मुनि, बड़े पिता रजनीश मुनि पहले ही धर्मसंघ में दीक्षित हैं। उनके पिता प्रकाश बुरड़ और मां ममता बुरड़ ने कहा कि दो बेटों को हमने तेरापंथ संघ को सौंपा है। अगर चार संतान होती तो भी चारों को खुशी-खुशी दीक्षा दे देते। समणी ओजस्वी प्रज्ञा और मुमुक्षु चंदनबाला भी सगी बहनें हैं। केसिंगा निवासी उनके माता पिता हरिराम जैन और कुसुमबाला जैन ने कहा कि चार बेटियों में से दो ने दीक्षा लेकर हमें धन्य कर दिया। संयम पथ पर वे अग्रसर होती जाएं। आचार्य महाश्रमण ने कहा, कितनी बड़ी बात है कि इस प्रकार भाई-भाई, बहन-बहन को, अपनी संतानों को श्रावक संघ में समर्पित कर देते हैं।

स्कूल संचालकों से कहा- भावनात्मक विकास भी करें
राज्य के प्राइवेट स्कूलों के लगभग 100 प्रतिनिधियों ने आचार्य महाश्रमण से प्रेरणा ली। आचार्य प्रवर ने उन्हें जीवन विज्ञान के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि बौद्धिक विकास के साथ भावनात्मक विकास करके ही हम अच्छे नागरिक तैयार कर सकते हैं। उन्होंने स्कूल के बच्चों को नैतिक शिक्षा और जीवन विज्ञान सिखाने की प्रेरणा दी। जिससे बच्चों का सम्पूर्ण विकास हो और वे राष्ट्र निर्माण में सहयोग दें।

दीक्षा यूं ही नहीं देते, कड़ी परीक्षा जरूरी: आचार्य महाश्रमण
आचार्य महाश्रमण जी ने कहा कि दीक्षा यूं ही नहीं दी जाती है। दीक्षा से पूर्व उन्हें शिक्षा देना और वे संयम पथ के लिये तैयार है कि नहीं, इसकी परीक्षा लेना आवश्यक होता है। समारोह में दीक्षा से पूर्व परिवार की लिखित और मौखिक अनुमति ली गई। दीक्षार्थियों से भी भरी सभा के सामने पूछा गया कि अगर वे संयम पथ पर चलने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं, तो ही दीक्षा स्वीकार करें। इसके बाद सबकी अनुमति से आचार्य महाश्रमण ने दीक्षा प्रदान की। सफेद वस्त्र में दीक्षा के लिए तैयार बैठे दीक्षार्थियों ने सबसे पहले अभिनंदन में पहनाई गई सूखे फूलों की माला उतारी फिर गृहस्थ का आसान छोड़ा।

 

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