पंजाबी मां-बोली पर विशेष:जेब से पैसे खर्च निशुल्क बांटते हैं किताबें, ताकि युवाओं को पढ़ने की आदत पड़े

 

लाइब्रेरी में किताबों पर चर्चा करते हरविंदर सिद्धू(लाल स्वेटर में)। - Dainik Bhaskar

लाइब्रेरी में किताबों पर चर्चा करते हरविंदर सिद्धू(लाल स्वेटर में)।

  • हरविंदर सिद्धू ने 16 साल पहले पंजाब में शुरू की 50 फीसदी डिस्काउंट पर किताबें देने की पहल

पंजाबी मेरी जान वरगी पंजाबी मेरी पहचान वरगी पंजाबी बुजुर्गां दी दुआ वरगी पंजाबी निरी खुदा वरगी भुल के वी ना इसनु भुलाउना क्योंकि पंजाबी है साड़ी मां वरगी

किसी बहुत ही खूबसूरत कवि, शायर या साहित्यकार ने इन खूबसूरत अक्षरों को एक सूत्र में पिरोकर पंजाबी मां बोली से प्यार का वर्णन किया है। पंजाब में पैदा हुए बड़े नामी साहित्यकार, कवि, शायर, नावलकार अपने-अपने तरीके से पंजाबी मां बोली की सेवा कर रहे हैं, लेकिन हम आपको एक ऐसी शख्सियत से मिलाने जा रहे हैं, जो पेशे से तो कृषि विभाग में डिवेलपमेंट अधिकारी हैं, लेकिन उनके अंदर एक कहानीकार व नावलकर के साथ पंजाबी भाषा के उत्थान के लिए दिल धड़कता है।

भारतीय सेना से रिटायर हुए हरभजन सिद्धू, जोकि खुद भी युवावस्था से राइटर हैं, के बेटे हरविंदर सिद्धू ऐसी शख्सियत हैं जो पिछले करीब 16 सालों से विद्यार्थियों, युवाओं, बुजुर्गों व अन्य लोगों को पहले 50 फीसदी डिस्काउंट पर किताबें मेले आदि में जाकर बेचते रहे।

इसके बाद 2013 से उन्होंने किताबें निशुल्क बांटनी शुरू कर दीं ताकि पंजाब के युवाओं को पढ़ने की आदत पड़े। वह कोरियर के पैसे भी खुद जेब से अदा करते हैं जिसमें हर माह उनके 5 से 7 हजार रुपए वेतन से खर्च होते हैं।

बकौल कृषि अधिकारी हरविंदर, वह आर्मी में रहे पिता संग पूरा देश घूमे हैं। पिता को युवावस्था से ही लिखने का शौक पड़ा जब घर में कागज तक मौजूद नहीं होता था। पिता से ही उन्हें किताबों से प्रति यह प्यार व लगाव मिला है जिसमें उनके 1984 में गांव भुच्चो कलां स्कूल में अध्यापक रहे अतरजीत जी का भी पूरा योगदान है जो उन दिनों विद्यार्थियों को निशुल्क किताबें प्रदान करते थे। वह कहते हैं कि जितना साहित्य हिंदी में उपलब्ध है, अगर यह पंजाबी में मिले तो बच्चे खुद-ब-खुद पंजाबी से जुड़ेंगे।

16 साल पहले डिस्काउंट पर किताबें दीं कबाड़ी व कूड़े के ढेर तक से उठाई किताबें

हरविंदर सिद्धू कहते हैं कि उन्होंने स्कूल समय से ही पिता को एक रक्षक के साथ एक लेखक के रूप में भी देखा है। पिता नौकरी से पहले ही कहानियां आदि लिखने का शौक रखते थे तथा आज तक वह लिखते हैं, लेकिन इसे कमर्शियल नहीं करते।

पिता से मिले यह गुण के बाद स्कूल में अपने अध्यापक अतरजीत जी को बच्चों को निशुल्क किताबें देते देखा ताकि वह पढ़ें। इसी बात को उन्होंने दिल में बिठा लिया। करीब 2004 के आसपास उनके मन में पंजाबी भाषा को लेकर विचारों की उथल-पुथल शुरू हुई तो उन्होंने जेब से पैसे लगाकर मेलों में किताबें ले जाना शुरू कर दिया जहां वह 50 फीसदी डिस्काउंट पर कहानियां, कविताएं व साहित्य आदि की किताबें बेचते। 2008 में मानसा में पंजाबी किताब घर खोला गया जो 2013 तक चला।

इसके बाद उन्होंने किताबों का फ्री वितरण ही शुरू कर दिया तथा कोरोना लॉकडाउन मार्च 2020 तक यह चला। जिसके बाद वह सोशल मीडिया पर अब किताबें प्रदान करते हैं जिसमें कोरियर का खर्च भी वह अपनी जेब से अदा करते हैं। हरविंदर ने अपने घर में भी अपनी लाइब्रेरी बनाई हुई है जहां करीब 1 हजार किताबों का संग्रह है।

हरविंदर सिद्धू कहते हैं कि उन्हें देश के जिस कोने में अच्छी किताब मिलती है, वह उसे खरीद लेते हैं। पहले वह किताबें को पढ़ते हैं तथा इसके बाद अपने रीडर को इसे पढ़ने के बारे में राय देते हैं। वह कहते हैं कि किताबों के हालात को कई बार ऐसे हुए हैं कि वह कबाड़ी से लेकर कचरे के ढेर से किताबें उठाकर लाए हैं। उन्होंने कहा कि फ्री देने के बाद अब लोग हाथों हाथ किताब ले लेते हैं, इसकी उन्हें खुशी होती है। उनकी सोच के हिसाब से बच्चों को छोटी आयु में ही पढ़ने का शौक डालना चाहिए।

हालांकि किताबें लेने को विदेशों से भी डिमांड आती है, लेकिन वह वहां किताबें नहीं भेजते। उन्होंने कहा कि कुछ किताबें बेहद विशेष हैं जो इस समय प्रिंटिंग में नहीं है, वह रीडर्स को पढ़ने भेजी जाती है जिसमें प्रो. सुखपाल की रहन किथाऊ नां यानी रहने को कोई जगह नहीं विशेष है जिसमें घर का बड़ा खूबसूरत वर्णन है।

हरिवंदर कहते हैं कि उनकी किताबें जम्मू-कश्मीर में तैनात एक सिपाही के पास जाती हैं तो मानसा में एक मोची भी रीडर है। हरविंदर कहते हैं कि हमें तोहफों में किसी गिफ्ट की जगह साहित्यक किताबों का चलन शुरू करना चाहिए। वह कहते हैं कि परिवार के सहयोग से ही वह इस जिम्मेदारी को चला पा रहे हैं।

 

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