दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी है मोसाद, सैटेलाइट हथियार का करते हैं इस्‍तेमाल

भारत का सबसे करीबी देश इजरायल, जिसने दुनिया को सेनाओं के क्षेत्र में कई ऐसी तकनीकों से नवाजा है, जिसके बारे में शायद ही कभी कल्‍पना की गई होगी. न सिर्फ इजरायलन डिफेंस फोर्सेज (आईडीएफ) ने दुनिया को सर्जिकल स्‍ट्राइक के मायने समझाए बल्कि मिलिट्री इंटेलीजेंस क्‍या होती है, इसका सही मतलब भी बताया. इजरायल के संबंध आज भले ही शांति समझौते के बाद यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) और दूसरे मुसलमान देशों से बेहतर हो रहे हों लेकिन यह बात सच है कि कभी इजरायल पर भी अपने अस्तित्‍व को बनाए रखने की बड़ी चुनौती थी. करीब एक करोड़ की आबादी वाले इस देश के नेतृत्‍व की मानें तो हर नागरिक की सुरक्षा उसका सबसे पहला धर्म है. ऐसे में इंटेलीजेंस एजेंसी मोसाद इसी धर्म को पूरा करने का एक मकसद है.

सन् 1949 में हुई शुरुआत

मोसाद की शुरुआत दिसंबर 1949 में हुई थी और उस समय इसे इंस्‍टीट्यूट फॉर को-ऑर्डिनेशन के तौर पर जाना जाता था. मोसाद दरअसल ब्रिटिश काल में फिलीस्‍तीन में यहूदी सेना की ही इंटेलीजेंस यूनिट थी जिसे हैगानाह के तौर पर जाना जाता था. रीयूवेन शिलोह जो इजरायल के बनने से पहले कई तरह के स्‍पेशल ऑपरेशंस और सीक्रेट डिप्‍लोमैसी में शामिल थे, वह इसके पहले डायरेक्‍टर बने.

शुरुआती दिनों में इस एजेंसी को ब्‍यूरोक्रेसी की वजह से खासी दिक्‍कतों से गुजरना पड़ा था. इसकी वजह से इसे ऑपरेशनल होने में करीब एक साल का समय लग गया. साल 1951 में इस एजेंसी को उस समय शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ा जब इराक की राजधानी बगदाद में इजरायली जासूसी रैकेट का भांडा फूटा था. इस घटना में इजरायल के कई इंटेलीजेंस ऑफिसर्स को गिरफ्तार किया गया था.

कई हाई रिस्‍क ऑपरेशंस

शिलोह सन् 1952 में रिटायर हो गए और फिर इसके बाद एजेंसी का जिम्‍मा इसार हैरेल पर आ गया. आज मोसाद जो कुछ भी है उसका श्रेय इसार को ही दिया जाता है. सन् 1952 से लेकर 1963 तक इसार इसके मुखिया रहे और उन्‍हें दुनियाभर में मोसाद के सफल ऑपरेशंस के लिए श्रेय दिया जाता है. साल 1960 में पूर्व नाजी एडोल्‍फ इचमन को अर्जेंटीन में मोसाद की टीम के पकड़ने से लेकर वॉर क्राइम्‍स के लिए चलाया गया ट्रायल हो या फिर कई और हाई रिस्‍क्‍स ऑपरेशंस हों, एजेंसी ने हर पल अपनी काबिलियत साबित की.

अरब देशों का काल मोसाद

मोसाद के कई इजरायली सीक्रेट एजेंट्स अरब और दूसरे देशों में मौजूद हैं. मोसाद के बारे में कहते हैं कि यह अपने दुश्मनों को बड़ी बेदर्दी से खत्‍म कर देती है. किसी राजनेता की हत्‍या करना हो, दूसरे देश में अराजकता फैलानी हो या सत्ता परिवर्तन कराना हो, यह सभी मोसाद के ऑपरेशनों में शामिल होते हैं. एजेंसी के एजेंटों की घुसपैठ दुनिया के दूसरे देशों की एजेंसियों में भी है. मोसाद के एजेंट अमेरिकी इंटेलीजेंस एजेंसी सीआईए से लेकर ब्रिटिश एजेंसी एमआई 5, एमआई 6 के साथ मिलकर काम करते हैं. यह कहना गलत न होगा कि मोसाद के ज्यादातर एजेंट इजरायल डिफेंस फोर्सेज (आईडीएफ) का हिस्‍सा होते हैं.

साइकोलॉजिकल वॉरफेयर में मास्‍टर

कहा जाता है कि मोसाद के एजेंट्स ने ही पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और व्‍हाइट हाउस इंटर्न मोनिका लेविंस्की के साथ बातचीत को रिकॉर्ड कर लिया था. इसके बाद और इनके सहारे बिल क्लिंटन तक को ब्लैकमेल किया था. मोसाद साइकोलॉजिकल वारफेयर में मास्‍टर है और उसके पास इसका पूरा विभाग है. साइकोलॉजिकल वॉरफेयर का डिपार्टमेंट यह तय करता है कि ऑपरेशन के कौन से खुफिया हिस्से को मीडिया में लीक करना है ताकि दुश्मनों के दिलो-दिमाग में भय और बदहवासी पैदा की जा सके. अ

अराफात को दिया जहर!

इसके अलावा एक डिपार्टमेंट बायोलॉजिकल और केमिकल टाइप के जहर की खोज करता है. ऐसा माना जाता है कि फिलीस्तीन नेता यासर अराफात को मोसाद ने ऐसा जहर देकर मारा था कि उसकी पहचान तक नहीं की जा सकी. मोसाद के पास दुनिया के हर नेता , प्रमुख व्यक्तियों और ऐसे लोगों की गोपनीय फाइलें हैं जिनके पास किसी तरह की कोई रणनीतिक महत्व की जानकारी होती है.

ट्रेनिंग सबसे बड़ी ताकत

मोसाद की ताकत है उसके एजेंट्स की ट्रेनिंग. कई देशों के खुफिया एजेंट्स को भी मोसाद से ट्रेनिंग लेने के लिए इसराइल भेजा जाता है. मोसाद को जिस सबसे बड़ी खूबी के कारण जाना जाता है वो हैं ‘फाल्स फ्लैग ऑपरेशन’या जिन्‍हें कोवर्ट ऑपरेशन्स के तौर पर भी जानते हैं. मोसाद में शामिल होने वाले जवानों को अलग से एक स्पेशल बेहद कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है और वह जब ट्रेनिंग का हर पड़ाव पार कर लेता है तभी उसे मैदान में उतारा जाता है. दुश्मन को चकमा देने की कला हो या मारकर गायब हो जाने वाली ‘किल एंड फ्ली’ तकनीक हो, मोसाद एजेंट्स हर विधा में एक्सपर्ट होते हैं. यह सब तब होता है जब इजरायल में आर्मी ट्रेनिंग अन‍िवार्य होती है.

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