ढल गया हथुआ राज का एक सूरज:86 वर्षीय बीपी शाही का निधन, राजसी की जगह आध्यात्मिक जीवन जीते थे

राजसी ठाट-बाट की जगह सादा जीवन जीते थे ब्रजेश्वर प्रसाद शाही। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar

राजसी ठाट-बाट की जगह सादा जीवन जीते थे ब्रजेश्वर प्रसाद शाही। (फाइल फोटो)

  • ब्रजेश्वर प्रसाद शाही की शादी में देश के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी आए थे
  • एनर्जी मेडिकल से लोगों का करते थे इलाज

बिहार के हथुआ स्टेट का एक सूरज रविवार को ढल गया। इस राजघराने के सबसे बुजुर्ग शख्स बीपी शाही का पटना स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वे पिछले कई सालों से बीमार चल रहे थे। ब्रजेश्वर प्रसाद शाही राजघराने का होने के बावजूद राजसी ठाठ-बाट से अलग रहते थे। वे ज्यादतर समय अध्यात्म को देते थे। वे इस मायने में अलग थे कि हजारों एकड़ जमीन और करोडो़ं की जायदाद रहने के बावजूद उनका मोह संपत्ति से नहीं रहा।

45 साल तक नियमित रूप से इलाज करते रहे
बीपी शाही का जन्म 1935 में पटना के अंटा घाट आवास में हुआ था। उन्होंने तीन विषयों साइकोलॉजी, इंग्लिश और म्यूजिक में एमए की डिग्री ली थी। 45 साल से वे नियमित रूप से रेकी ज्योतिष केन्द्र का संचालन करते रहे। इंस्टीच्यूट ऑफ हीलिंग एंड अल्टरनेटिव थेरेपी स्थापित किया। उनके पास कैंसर से लेकर ब्रेन, अर्थराइटिस आदि से जुड़े जटिल मरीज पहुंचते थे। पहले योग और न्यास अलग-अलग था। लेकिन बीपी शाही ने योग-न्यास को एक साथ जोड़ा। एनर्जी मेडिकल से वे लोगों का इलाज करते थे। हिंदी, अंग्रेजी के अलावा उन्होंने स्वध्याय से संस्कृत, बंग्ला और जर्मन भाषा भी सीखी। किताबें पढ़ने के ऐसै शौकीन कि उनकी लाइब्रेरी में हजारों किताबें हैं।

शादी में आए थे राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद
उनकी बहू सुनीता शाही बताती हैं कि एनर्जी मेडिकल के तहत बीमार व्यक्ति का इलाज वे अपने अंदर की अध्यात्मिक शक्ति से करते थे। उनका मानना था कि चक्र बैलेंस करने से कई तरह की बीमारियां ठीक हो जाती हैं। इसके लिए वे दो दिनों तक पद्धति का जानकारी देते थे और उसके बाद 30 दिनों तक साइकिल प्रैक्टिस कराते थे। सुनीता ने उनसे यह विद्या सीखी है। बीपी शाही के पुत्र प्रणव शाही कहते हैं कि पिता जी ने अपने अंदर अध्यात्म की ऐसी शक्ति विकसित कर ली थी, जिससे वे हमेशा समाज को खुशी बांटते रहे। बीमार लोगों को ठीक करते रहे। उन्होंने बताया कि पिता जी की शादी में देश के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी आए थे। उनके सरोकार अच्छे लोगों से रहे।

रोज लिखते थे डायरी
सुनीता बताती हैं कि बाबा वेजिटेरियन थे। लहसन-प्याज तक नहीं खाते थे। सुबह 5 बजे ही उठ जाते और नित्य क्रिया से निवृत होने के बाद 11 बजे तक माता काली की आराधना में बैठ जाते थे। जिसके बाद 12 बजे से ढ़ाई बजे तक क्लिनिक में मरीजों को देखते। खाना काफी कम खाते। रात 8 बजे डायरी लिखने बैठ जाते। वे हर दिन डायरी लिखते। डायरी में क्या लिखते थे? इसके जवाब में सुनीता शाही कहती हैं कि मन में जो भी अच्छे विचार आते वे उसे लिखते। वे कहते थे कि हम अच्छा सोचते हैं तो अच्छा होगा। वे जिससे मिलते उसे निगेटिव फीलिंग को अपने अंदर से हटाने पर जोर देते।

रामकृष्ण परहमहंस के शिष्य बन गए थे
धन-संपत्ति छोड़ उन्होंने खुद को काली भक्त रामकृष्ण परहमहंस की परंपरा से जोड़ लिया था। कोलकाता के श्रीराम ठाकुर को अपना गुरु मान लिया था। लेकिन हमेशा पूजा साधना करने की बजाय लोगों के इलाज में पूरी जिंदगी लगा दी। इलाज भी ऐसा कि अपनी एनर्जी से दूसरे के शरीर का इलाज कर देते थे।

 

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